काँच की बरनी और दो कप चाय - एक बोध कथा
>> Thursday, September 18, 2008
उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी (जार) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ... आवाज आई...
फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे-छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये, धीरे-धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये, फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्या अब बरनी भर गई है, छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ.. कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया, वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई, अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे...
फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ.. अब तो पूरी भर गई है.. सभी ने एक स्वर में कहा.. प्रोफ़ेसर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली, चाय भी रेत के बीच में स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई...
प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया - इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो.... टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान, परिवार, बच्चे, मित्र, स्वास्थ्य और शौक हैं,
छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी, कार, बडा़ मकान आदि हैं,
और रेत का मतलब और भी छोटी-छोटी बेकार सी बातें, मनमुटाव, झगडे़ है..
अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती, या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते, रेत जरूर आ सकती थी..
ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है...यदि तुम छोटी-छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा..
मन के सुख के लिये क्या जरूरी ह? ये तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो, बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ, घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको, मेडिकल चेक- अप करवाओ..टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो, वही महत्वपूर्ण है...
पहले तय करो कि क्या जरूरी है... बाकी सब तो रेत है..
छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे... अचानक एक ने पूछा, सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि "चाय के दो कप" क्या हैं ? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये, बोले.. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया... इसका उत्तर यह है कि, जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे, लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये ।
भगवान का स्मरण किसी सौदे के तहत नहीं ...
>> Wednesday, August 6, 2008
कच्चे तेल और सोने की रिश्तेदारी
नज़रों का फर्क
>> Friday, August 1, 2008
सफलता की कुंजी
>> Wednesday, July 23, 2008
योग्यता की परख
एक राजा के पास दो व्यक्ति आए और बोले, 'महाराज, हम नौकरी की तलाश में आए हैं। कोई काम मिल जाए तो कृपा होगी।' राजा ने उन दोनों को अलग-अलग बागों की रखवाली का काम दे दिया। एक दिन राजा अपने मंत्री के साथ एक बाग में गए। उसकी रखवाली करने वाले का नाम था - झूमर सिंह। उसने राजा और मंत्री का स्वागत किया और उनके लिए बाग से आम तोड़ लाया। राजा और मंत्री ने आम खाने शुरू किए, लेकिन जल्दी ही थूक दिए। आम बेहद खट्टे थे। यह देख झूमर सिंह डर गया। उसे लगा राजा उसे दंडित करेंगे, लेकिन राजा ने कुछ नहीं कहा और चुपचाप मंत्री के साथ दूसरे बाग में चले गए। उसकी रखवाली अभयमल कर रहा था। उसने राजा और मंत्री को देखते ही उनके सामने थाल में आम सजाकर रख दिए और बोला, 'ये आम सभी बागों से ज़्यादा मीठे और स्वादिष्ट हैं। आप इन्हें खाकर प्रसन्न होंगे।' आम वास्तव में बहुत मीठे थे। राजा और मंत्री ने खूब आम खाए। फिर दोनों राजमहल लौट आए। दूसरे दिन राजा ने दोनों रखवालों को राजमहल बुलाया। उन्होंने अभयमल से कहा, 'आज से तुम दोनों बागों की रखवाली करोगे।' अभयमल खुश हो गया। इसके बाद राजा ने अपने गले का हार झूमर सिंह के गले में डालते हुए कहा, 'आज से तुम मेरे खजांची नियुक्त किए जाते हो।' झूमर सिंह भौचक रह गया। मंत्री को भी यह अटपटा लगा। वह तो सोच रहा था कि झूमर सिंह को सज़ा मिलेगी पर हुआ एकदम उलटा। उसने कुछ दिनों के बाद राजा से साहस करके इस बारे में पूछा। राजा ने मुस्कराते हुए कहा, 'झूमर सिंह ने जिस बाग की रखवाली की, उसका एक आम भी उसने स्वयं नहीं चखा। इसी कारण उसे पता नहीं था कि आम खट्टा है या मीठा। जबकि अभयमल ने आम चख लिया था, इसलिए उसे पता था कि आम मीठा है। मुझे लगता है कि झूमर सिंह ज्यादा ईमानदार है। इसलिए मैंने उसे खजांची बनाया।'
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