इंटरनेट एक्सप्लोरर इस्तेमाल करने वाले सावधान

>> Saturday, December 20, 2008

लंदन. माइक्रोसाफ्ट ने ऐलान किया है कि दुनिया का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जानेवाला वेब ब्राउजर इंटरनेट एक्सप्लोरर खतरनाक है। माइक्रोसाफ्ट ने कहा कि इसे इस्तेमाल करने वाले यूजर्स के कम्प्यूटर हैक हो सकते हैं। इसका कारण एक्सप्लोरर की सुरक्षा खामिया हैं। खुद इंटरनेट एक्सप्लोरर को बनाने वाले माइक्रोसाफ्ट कापरेरेशन ने इस बात की घोषणा कर इंटरनेट यूजर्स में डर पैदा कर दिया है। उन्होंने इस बात का खुलासा किया है कि उनके वेबबाउजर को इस्तेमाल करने वाले कई लोगों की गोपनीय जानकारियां चोरी हो गई हैं। यह चोरी उस वक्त हुई जब उनके यूजर ने कुछ विशेष वेबसाइट्स सर्फ की।

माइक्रोसाफ्ट ने अपने ब्लॉग मालवेर प्रोटेक्शन में यह साफ साफ कहा है कि इंटरनेट एक्सप्लोरर 7 इस्तेमाल करनेवाले यूजर के कम्प्यूटर हैक किए गए हैं। इस बात से सबसे ज्यादा चीनी वेबसाइट्स को नुकसान पहुंचा है। कई गेम कंपनी की साइट से सूचना चुरा कर हैकर्स ने उन्हें कालेबाजार में बेच दिया है। हैकर बैंक और अन्य गोपनीय सूचना भी चुराने में कामयाब रहे हैं। माइक्रोसाफ्ट इससे निपटने के लिए काम कर रहा है। फिलहाल उसने अपने यूजर्स से एंटी वायरस और एंटी स्पायवेर इस्तेमाल करने का आग्रह किया है। वेब विशेषज्ञों के अनुसार इंटरनेट एक्सप्लोरर के बजाए फायरफॉक्स, सफारी या ओपेरा वेब ब्राउजर इस्तेमाल करना बेहतर होगा।

http://www.microsoft.com/technet/security/bulletin/ms08-078.mspx


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‘वेडनेसडे’ से वेडनेसडे तक

>> Saturday, November 29, 2008

परदे के पीछ आतंकवादियों ने नसीरुद्दीन शाह अभिनीत ‘ए वेडनेसडे’ देखी है जिसमें नायक कहता है कि दुष्ट शक्तियों ने शुक्रवार, शनिवार को हमले किए हैं। जिसके जवाब में मैंने बुधवार को चुना। इस राष्ट्रीय संकट की घड़ी में मन में उठे ज्वारभाटे को संयत रखकर तर्क के आधार पर मनन करना चाहिए। इस समय अपने राजनीतिक विचारों और व्यक्तिगत-धार्मिक पूर्वग्रहों को तजकर सोचना चाहिए। यह नारेबाजी का समय नहीं है।

कांग्रेस को दोष देने वाले भूल जाते हैं कि वाजपेयी के शासनकाल में आतंकी संसद में घुस गए थे। नरेंद्र मोदी जैसे सशक्त मुख्यमंत्री की नाक के नीचे अहमदाबाद में आक्रमण हुए और जयपुर के साइकिल बम धमाकों को कैसे भूला जा सकता है। आतंकवादी संगठन यह नहीं देखते कि कौन सत्तासीन है। यह मामला धर्म से भी नहीं जुड़ा है।

गौरतलब है कि जैसे भारत में अनेक भारत मौजूद हैं, वैसे ही पाकिस्तान में अनेक पाकिस्तान मौजूद हैं और वहां का अवाम भी हमारे अवाम की तरह असहाय है। पाकिस्तान में विगत साठ वर्षो से सेना प्रमुख भूमिका में हैं और इतनी शक्तिशाली है कि नेताओं की इच्छा के खिलाफ भी काम करती है।

पाकिस्तान की जन आकांक्षा को सेना कभी अहमियत नहीं देती। तालिबान ताकतों की घुसपैठ पाकिस्तानी समाज और सरकार में बहुत गहरी है और उन्हें भारत को नुकसान पहुंचाना पसंद है। पाकिस्तान से आकर मुंबई पर आक्रमण करने वाले न इस्लामी हैं और न ही पाकिस्तानी। वे उस दल के हैं जो पूरे विश्व में शांति के खिलाफ हैं।

भारत पर विश्व की मंदी का असर अन्य देशों की तुलना में कम पड़ रहा था, अत: उसके आर्थिक आधार पर आघात किया गया है। भारत के तमाम शहरों से भारी मात्रा में धन मुंबई आता है क्योंकि तमाम बड़ी कंपनियों के मुख्यालय यहां पर हैं, अत: मुंबई को अस्थिर करना उन्हें भारत को तोड़ने की तरह लगता है।

आमतौर पर हमले आम आदमी के ठिकाने पर होते आए हैं और पहली बार भारत के अमीर लोगों के ठिओं को निशाना बनाया गया है। नवंबर और दिसंबर के पहले दो सप्ताहों में अनेक मल्टीनेशनल कंपनियों के शिखर अधिकारी भारत आते हैं और नए व्यापारिक अनुबंध होते हैं। अत: इस बार एक तीर से दो शिकार किए गए।

आतंकवादी संगठनों में बहुत काबिल लोग सक्रिय हैं और उनके पास हमारी पुलिस से अधिक जानकारियां हैं। मुंबई के नरीमन भवन में इजरायली रहते हैं जैसी जानकारी भी उनके पास थी। टेक्नोलॉजी का भरपूर फायदा वह उठाते हैं। उनके पास पुलिस से बेहतर शस्त्र हैं। उनका प्रशिक्षण भी उच्चतम मानदंड पर किया गया है। उनके मन में पैदा किया गया उन्माद और मृत्युइच्छा उनकी कुशलता को धार प्रदान करती है। इस राष्ट्रीय संकट से उबरने में केवल एक ही चीज हमारी सहायता कर सकती है और वह है राष्ट्रीय चरित्र का विकास और उसकी निर्भीक अभिव्यक्ति।

यह काम राजनैतिक दल नहीं कर सकते क्योंकि राष्ट्रीय चरित्र के विकास के साथ ही उनके निजी स्वार्थ और सत्ता का लालच मर जाएगा। सत्ता के समीकरणों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय चिंता का समय है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश की सुरक्षा और उनका भविष्य उनके भूतकाल से जुड़ा है और समग्र एशिया की शांति के उद्देश्य के साथ ही यह लड़ाई लड़ी जा सकती है।

दैनिक भास्कर से सभार

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जीवन में भी है गार्बिज इन, गार्बिज आउट

>> Friday, November 21, 2008

एक बालक अपने पिता के साथ भ्रमण करते हुए किसी पर्वतीय क्षेत्र में जा पहुंचा। चारों ओर ऊंचे-ऊंचे पर्वत मानो उन्हें चिढ़ा रहे थे। अचानक वहां एक स्थान पर बच्चे का पैर फिसला। पैर फिसलने पर उसके मुंह से 'आह-आह' का स्वर निकला। यही आह-आह की आवाज पहाड़ों से भी प्रतिध्वनित होकर आई, जिसे सुनकर वह बच्चा हैरान रह गया। इस पर बच्चा जोर से चिल्लाया- तुम कौन हो, वापस लौटकर वही आवाज आई - तुम कौन हो? इस पर नाराज़ होकर बच्चा बोला- तुम कायर हो। तब पलटकर आवाज आई- तुम कायर हो।
बालक ने चकित होकर अपने पिता से पूछा- यह क्या हो रहा है? पिता मुस्कराए और बोले- अब मैं भी कुछ कहता हूं, इसे ध्यान से सुनना। इतना कहकर वे जोर से चिल्लाए- मैं तुम्हारी प्रशंसा करता हूं। तुम अद्भुत हो। वही आवाज लौटकर आई। बालक को कुछ भी समझ न आया। तब पिता ने बताया कि आवाज के इस तरह लौटकर आने को प्रतिध्वनि कहते हैं। जो बात हम पहाड़ों से कहते हैं, वही बात लौटकर हमारे पास आती है। 

फिर पिता ने समझाया- बेटा, जीवन भी ऐसा ही है। यहां हम जो भी कहते या करते हैं, वही हमें वापस मिलता है। हमारा जीवन हमारे कामों की ही प्रतिच्छाया है। 

पुन: उन्होंने समझाते हुए कहा- जब हम छोटे थे तो हमें पढ़ाया जाता था कि जैसा बोओगे, वैसा काटोगे। कंप्यूटर की आधुनिक भाषा में यही बात इस तरह कही जाती है- गार्बिज इन, गार्बिज आउट। इस संसार का यही नियम है। हमेशा ऐसा ही होता आया है। बस हमें यह पता नहीं होता कि कब और कैसे कोई बात हो जाती है? यदि हम किसी को मित्र बनाते हैं, तो हमें उससे निष्कपट प्रेम करना होगा। 

किसी को धन-संपत्ति दे देना प्रेम नहीं होता, किंतु किसी की व्यथा का अनुभव कर उससे मीठा बोलना या सहानुभूति देना महत्व रखता है। जब हम कष्ट में मदद का हाथ बढ़ाते हैं, तो हम बहुत कुछ दे देते हैं। पर कई बार लोगों का व्यवहार इसके उलट होता है। अगर कोई व्यक्ति अपने किसी पड़ोसी की कोई मदद करता है, तो कुछ समय बाद वह पड़ोसी को उसके प्रति किए गए उपकारों की याद दिलाता है कि देखो, मैंने तुम्हारी फलाना-फलाना सहायता की थी। इस तरह उन अच्छे कामों को गिन-गिन कर पड़ोसी पर कृतघ्नता का बोझ लादते हैं। यही नहीं, दूसरों के राई भर दोष को बिल्व फल के समान तथा अपने बिल्व के समान दोष को राई के समान समझते हैं। 

समस्या तो यह है कि हम ईश्वर तक से ऐसा ही व्यवहार करते हैं। ईश्वर हमें अपने दिव्य भंडार से दिल खोलकर अन्न, जल, प्रकाश तथा वायु देता है, परंतु इतना सब कुछ पाने पर भी हम उसके अहसान को भूल जाते हैं। यदि हमें ईश्वर से तथा उसके बनाए हुए जीवों से प्रेम चाहिए, तो हमें अपने आप में नदी जैसी उदारता, सूर्य जैसी कृपालुता तथा पृथ्वी की भांति आतिथ्य भाव उत्पन्न करना होगा। हम वणिक की भांति व्यापार की भावना न रखें कि एक सत्कार्य के बदले में फल की प्रतीक्षा करने लगें। किसी नेकी और प्रेम का प्रतिदान कब कहां और किस रूप में मिलेगा- इसका हमें ज्ञान नहीं हो सकता, पर जीवन में वह प्रतिदान मिलता अवश्य है।

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चंद्रयान हम और आप

>> Wednesday, November 19, 2008

भारत चांद पर जा पहुंचा है? यकीन नहीं होता… यह महानगरों की टूटी- फूटी सड़कों वाला, गांवों में गुल बिजली वाला देश चांद पर जा पहुंचा है? कब हो गया, कैसे हो गया, किसने किया यह चमत्कार?

जब हम सरकारी दफ्तरों में चाय पीते, फाइलें टालते समय गुजार रहे थे, घर का कचरा गली में फेंक कर सफाई कर रहे थे, सड़कों पर थूक रहे थे, भाषा-जाति-धर्म-प्रांत के नाम पर फूट डालने वाले नेताओं के पीछे अंधों की तरह भाग रहे थे, सिनेमा और क्रिकेट के नायकों पर फिदा हुए जा रहे थे….

तब कुछ गुमनाम वैज्ञानिक देश के किसी गुमनाम कोने में अपने जीवन के अमूल्य वर्ष बिता कर भारत को चांद पर भेजने के लिए काम कर रहे थे। चंद्रयान को बनाने के पहले और उसके जरिए  चांद पर तिरंगा भेजने के बाद भी, ये सारे वैज्ञानिक अब भी स्वेच्छा से गुमनामी में हैं, अब भी भारत के लिए काम कर रहे हैं।

आज लालबहादुर शास्त्री होते तो उन्हें इन वैज्ञानिकों पर गर्व होता।

भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकउल्ला खां, सुखदेव और राजगुरू होते तो उन्हें इन वैज्ञानिकों पर गर्व होता।

क्या आपको गर्व है अपने इन देशवासियों पर जिनकी कर्तव्यनिष्ठा से आज चांद पर तिरंगा मौजूद है?

अगर है, तो कृपया आप उनके सम्मान में कुछ करिए।

ज्यादा नहीं, सिर्फ इतना ही कि आपके जो सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्य हैं उन्हें निभाने की कोशिश करिए।

कोशिश करिए कि जिस दफ्तर की तनख्वाह आपको रोटी देती है, उसका कार्य पूरी निष्ठा से करें।

कोशिश करिए कि सार्वजनिक स्थान पर आप कचरा फेंकने के भागी न बनें।

कोशिश करिए कि ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन आपके द्वारा न हो।

कोशिश करिए कि बिना लाउडस्पीकर लगाए समारोह- त्योहार की खुशी मना सकें।

कोशिश करिए कि अपने गांव- शहर- कस्बे में वृक्षारोपण करने में सहभागी बन सकें।

कोशिश करिए कि बांटने की भाषा बोलने वाले हर राजनेता से दूर रह सकें।

सबसे बढ़ कर: यह मत देखिए कि दूसरा क्या कर रहा है, यह देखिए कि आप क्या कर रहे हैं।  

बहुत सारी बातें हैं जो आप अपने देश को गर्व करने लायक बनाने के लिए कर सकते हैं।

कोशिश तो करिए। 

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The Fact of Section 49-O if Indian Constitution

>> Thursday, October 16, 2008

Dear Fiends,

These day another hoax mail is spreading with following text:
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Section 49-O of the Conduct of Election Rules 1961.

Did you know that there is a system in our constitution, as per the 1969 act, in section "49-O" that a person can go to the polling booth, confirm his identity, get his finger marked and convey the presiding election officer that he doesn't want to vote anyone!Yes such a feature is available, but obviously these seemingly notorious leaders have never disclosed it. This is called "49-O". Why should you go and say "I VOTE NOBODY"...

Because, in a ward for example, if a candidate wins, say by 123 votes, and that particular ward has received "49-O" votes more than 123, then that polling will be cancelled and will have to be re-polled. Not only that, but the candidature of the contestants will be removed and they cannot contest the re-polling, since people had already expressed their decision on them. This would bring fear into parties and hence look for genuine candidates for their parties for election. This would change the way, of our whole political system...

It is seemingly surprising why the election commission has not revealed such a feature to the public....It Seems to be a wonderful weapon against corrupt parties in India...

Show your power, expressing your desire not to vote for anybody, is even more powerful than voting...

So don't miss your chance.

So either “VOTE”, or vote “NOT TO VOTE” (vote 49-O)
We, the people of India, can really use this power to save our nation।


Use your voting right for a better INDIA।

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I’ve gone thru it and find some Fact, which I’d like to share with you.

In Indian Constitution there is No any Section 49-O

The Said Section is Available with Indian Ministry of Law and Justice, THE CONDUCT OF ELECTIONS RULES, 1961 which says

“49-O. Elector deciding not to vote.-If an elector, after his electoral roll number has been duly entered in the register of voters in Form-17A and has put his signature or thumb impression thereon as required under sub-rule (1) of rule 49L, decided not to record his vote, a remark to this effect shall be made against the said entry in Form 17A by the presiding officer and the signature or thumb impression of the elector shall be obtained against such remark.”

This is the Real Fact।


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क्या टीवी चैनल ऎसा नहीं कर सकते?

>> Saturday, October 4, 2008

बात उस समय की है, जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी एक आत्मघाती हमले में मारे गए थे। प्रसिद्ध अमेरिकी पत्रिका “ टाइम” ने उस हादसे की तस्वीर प्रकाशित नहीं की। लेकिन अपने इस फैसले के बारे में एक संपादकीय जरूर प्रकाशित किया।

“टाइम” ने लिखा, बावजूद इसके, कि यह हादसा दुनिया पर असर डालने वाली घटनाओं में से एक था, बावजूद इसके, कि राजीव गांधी विश्व के एक प्रमुख नेता थे, उन्होंने संपादकीय मंडल के विचार-विमर्श के बाद उनकी मृत्यु की तस्वीर प्रकाशित नहीं करने का फैसला किया।

“टाइम” के संपादकीय में लिखा गया था, कि “वे तस्वीरें प्रकाशित नहीं करने का फैसला इसलिए किया गया कि मौत ने उन्हें वह गरिमा नहीं बख्शी जिसके वह हकदार थे। हम वे तस्वीरें नहीं प्रकाशित कर उनकी गरिमा की रक्षा करना चाहते थे।“

यह बात हम भारतीय समाचार टीवी चैनलों को याद दिला कर एक अनुरोध करना चाहते हैं, कम से कम लाशों की तसवीरें तो प्रसारित नहीं करिए।

बम विस्फोट हो, या चामुंडा मंदिर में भगदड़, या लखनऊ फ्लाईओवर के धंसने से उसके नीचे दबे मृत शरीर- उनकी तस्वीरें दिखा कर क्या आप किसी मृतक की गरिमा का अनादर नहीं कर रहे? क्या उनके शोकग्रस्त परिवारों के प्रति आप यत्र- तत्र बुरी हालत में पड़ी लाशों की तस्वीरें टीवी पर दिखा कर उस हादसे से भी ज्यादा क्रूरता नहीं बरतते?

कितने ही अखबारों ने भोपाल गैस कांड के बाद लाशों की वीभत्स तस्वीरें छपने से परहेज किया था। तस्वीरें छपीं जरूर, लेकिन प्रतीकात्मक।

हादसों की रिपोर्टिंग करते समय क्या टीवी चैनलों पर भी पत्रकारिता की इस गरिमामय परंपरा का पालन नहीं किया जा सकता?

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विद्वता के साथ मनुष्य में विनम्रता भी होनी चाहिए।

>> Wednesday, October 1, 2008

महाकवि माघ राजा भोज के राज्य में रहते थे। उन्हें अपनी विद्वता का बड़ा घमंड था। एक बार वह राजा भोज के साथ जंगल में घूमने निकले। लौटते समय शाम हो गई। वे किसी आश्रय की तलाश करने लगे। तभी उन्हें एक झोपड़ी दिखाई दी, जिसके बाहर एक बुढ़िया बैठी थी। महाकवि माघ ने बुढ़िया से पूछा, 'यह रास्ता किधर जाता है?' वृद्धा ने एक क्षण रुककर कहा, 'रास्ता तो कहीं नहीं जाता। वह तो अपने स्थान पर स्थिर है, केवल यात्री आते-जाते हैं। परंतु तुम कौन हो?' माघ ने उत्तर दिया, 'हम यात्री हैं।' यह सुन वृद्धा मुस्कराई और बोली, 'यात्री तो दो ही होते हैं- सूर्य और चंद्रमा, तुम कौन हो?' महाकवि अचरज में पड़ गए और बोले, 'हम राजा हैं।' उन्होंने सोचा कि शायद इस उत्तर का बुढ़िया पर प्रभाव पडे़ और वह आगे प्रश्न न करे, पर वृद्धा बोली, 'नहीं! आप लोग राजा नहीं हो सकते, क्योंकि राजा तो दो ही हैं- एक इंद्र और दूसरा यम।' महाकवि विचलित हो उठे और बोले, 'हे मां, हम क्षणभंगुर मनुष्य हैं।' तब वृद्धा बोली, 'क्षणभंगुर भी दो ही होते हैं- पहला धन और दूसरा यौवन। पुराण कहते हैं कि इन दोनों पर विश्वास नहीं करना चाहिए।' वृद्धा की हाजिर जवाबी ने महाकवि को चक्कर में डाल दिया। वह बोले, 'हम सबको क्षमा करने वाली आत्मा हैं।' यह सुनकर वृद्धा मुस्कराई और बोली, 'इस संसार में सबको क्षमा करने वाली दो ही चीजें हैं- पृथ्वी और नारी। तुम इन दोनों की बराबरी कैसे कर सकते हो?' अब माघ ने हाथ जोड़कर कहा, 'मां, हम हार गए, अब तो रास्ता बताओ।' वह बोली, 'तुम हारे कहां हो? हारता तो वह है जिसने ऋण लिया हो या फिर जिसने चरित्र खो दिया हो। तुम इन दोनों में से किस श्रेणी में आते हो?' माघ अवाक रह गए। तब वृद्धा बोली, 'महाकवि माघ, मैं तुम्हें अच्छी तरह पहचानती हूं। विद्वता के साथ मनुष्य में विनम्रता भी होनी चाहिए। इसलिए अहंकार से दूर रहकर विनम्रता को अपनाओ, तभी श्रेष्ठ विद्वान कहलाओगे।'

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