भगवान का स्मरण किसी सौदे के तहत नहीं ...

>> Wednesday, August 6, 2008

महाराज युधिष्ठिर ध्यानमग्न बैठे थे। जब उन्होंने आंखें खोलीं, तो द्रौपदी ने कहा, 'धर्मराज! आप भगवान का इतना ध्यान करते हैं, उनका भजन करते हैं, फिर उनसे यह क्यों नहीं कहते कि हमारे संकटों को दूर कर दें। इतने सालों से हम वन में भटक रहे हैं। इतना कष्ट होता है, इतना क्लेश। कभी पत्थरों पर रात बितानी होती है तो कभी कांटों में। कहीं प्यास बुझाने को पानी नहीं मिलता, तो कभी भूख मिटाने को भोजन नहीं। इसलिए भगवान से कहिए कि वे हमारे कष्टों का अंत करें।' इस पर युधिष्ठिर बोले, 'सुनो द्रौपदी! मैं भगवान का स्मरण किसी सौदे के तहत नहीं करता। मैं आराधना करता हूं क्योंकि इससे मुझे आनंद मिलता है। उस विशाल पर्वतमाला को देखो। उसे देखते ही मन प्रसन्न हो उठता है। हम उससे कुछ मांगते नहीं। हम उसे देखते हैं इसलिए कि उसे देखने में हमें प्रसन्नता मिलती है। पूरी प्रकृति से हमारा रिश्ता ऐसा ही है। बिना किसी प्राप्ति की आशा से ही हम उससे जुड़ते हैं। इसमें असीम सुख की अनुभूति होती है। मैं ऐसे ही सुख के लिए ईश्वरोपासना करता हूं, व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं।'

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कच्चे तेल और सोने की रिश्तेदारी

मैं शुरुआत करता हूं उस दिलचस्प बातचीत से जो मैंने हाल में सुनी। मैं एक दोस्त के साथ एक ट्रेडर के डीलिंग रूम में बैठा हुआ था। मैंने चीफ डीलर से सवाल किया, 'आखिर तेल को हुआ क्या है? रेकॉर्ड ऊंचाई से उसकी कीमतें 20 फीसदी नीचे आ चुकी हैं। क्या अब आप खरीदारी करेंगे?' उन्होंने जवाब दिया, 'कच्चे तेल के दामों में कमी, बिकवाली और विकसित मुल्कों विकास को लेकर पैदा हुई आशंका की वजह से है। इसलिए इसकी मांग कम हो सकती है।' इसके बाद डीलर ने ईरान (ग्लोबल लेवल पर तेल के कुल उत्पादन के 40 फीसदी हिस्से पर नियंत्रण रखने वाले ओपेक का सदस्य) में किसी को फोन लगाया। मैंने उन्हें कहते हुए सुना, 'क्या इस्राइल और ईरान के बीच कशमकश जारी है? इराक, नाइजीरिया से सप्लाई में रुकावट का खतरा बना हुआ है। अमेरिकी भंडार में कमी आ रही है और तेल के नए भंडार नहीं मिले हैं।' मैं इस बात को लेकर निश्चित था कि उनकी अगली प्रतिक्रिया ज्यादा कच्चा तेल खरीदने की होगी क्योंकि उनके मुताबिक आपूर्ति असुरक्षित बनी हुई है। चौंकाने वाले घटनाक्रम में उस व्यक्ति ने दूसरी टेलीफोन कॉल दक्षिण अफ्रीका में किसी को लगाई और सवाल किया, 'खनन उद्योग के क्या हाल हैं? सोने की मात्रा में कोई बढ़ोतरी हुई है? क्या सोने की खदानों को एस्कॉम की ओर से बिजली आपूर्ति में बाधा का सामना करते रहना होगा?' दूसरी तरफ से पहले सवाल का जवाब 'न' था और दूसरे का 'शायद'। डीलर ने कहा, 'ठीक है 50 लाख डॉलर का सोना खरीद लो।' मेरा दिमाग घूम गया और मैं यह पूछने पर मजबूर हो गया, 'आपकी आखिरी कॉल के बाद मुझे भरोसा था कि आप और कच्चा तेल खरीदने का ऑर्डर देंगे। अचानक सोना कहां से बीच में आ गया?' वह मुस्कराए और मुझे एक चार्ट दिखाया। उन्होंने मुझसे सवाल किया, 'अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों का दुनिया भर में दामों के सामान्य स्तर से क्या लेना है?' मैंने कहा, 'जाहिर है, कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से महंगाई दर को रफ्तार मिलती है।' उन्होंने आगे सवाल किया, 'क्या सोना मुद्रा का प्रतिनिधित्व करने की एक किस्म है?' मैंने जवाब दिया, 'जी, बिलकुल। वास्तव में 1900 में दुनिया के ज्यादातर मुल्कों में सोने के मानक थे- यानी इस सुनहरी धातु को विनिमय के माध्यम के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था।' मान लीजिए कि आज सोना एक मुद्रा है। एक बैरल कच्चा तेल खरीदने के लिए आपको कितना सोना चाहिए होगा? या फिर एक औंस सोना लेने के लिए आपको कितने बैरल कच्चे तेल की जरूरत होगी? जवाब है कि एक औंस सोने के लिए आपको 7।3 बैरल कच्चा तेल चाहिए होगा। इस अनुपात को सोना-तेल रेशियो के नाम से जाना जाता है। उन्होंने कहा, 'आप लंबे वक्त के चार्ट पर गौर करें, एक औंस सोने के लिए आपको 14.5 बैरल कच्चे तेल की जरूरत होती थी, लेकिन अब सिर्फ 7.3 बैरल की आवश्यकता है।' मैंने हां में जवाब दिया और कहा, 'ऐसा इसलिए है क्योंकि कच्चा तेल 1980 में 38 डॉलर प्रति बैरल से 123 डॉलर पर जा पहुंचा है, जबकि सोने की चाल में इतनी रफ्तार देखने को नहीं मिली है। वह अब भी करीब 910 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रहा है, जो 1980 के 850 डॉलर प्रति औंस से कुछ ज्यादा है।' वह उत्साहित होकर बोले, 'ठीक फरमाया। मौजूदा कीमतों के आधार पर सोना-तेल अनुपात को 14.50 की दीर्घकालिक औसत तक पहुंचने के लिए या तो कच्चे तेल के दामों को 63 डॉलर प्रति बैरल तक लुढ़कना होगा या फिर सोने की कीमतों को 1,700 डॉलर तक पहुंचना होगा।' जब उनके दफ्तर से बाहर निकल रहा था तो मेरे दिमाग में यह बात आई कि ईरान, इराक और नाइजीरिया जैसे मुल्कों में भौगोलिक-राजनीतिक हालात में अनिश्चितता साफ देखी जा सकती है। नए भंडार भी नहीं मिल रहे। कच्चे तेल का 63 डॉलर के स्तर तक आना मुमकिन नहीं दिख रहा, ऐसे में सोना कहां जाएगा? अमेरिका मंदी के मुहाने पर खड़ा है, वित्तीय संकट अभी खत्म नहीं हुआ है, महंगाई दर अपनी तेज गति जारी रखे हुए है और अमेरिकी डॉलर टूट रहा है। कुल मिलाकर सोने के दाम बढ़ने के तमाम कारण मौजूद हैं। संयोग से उसी वक्त मुझे मेरे स्टॉक ब्रोकर ने फोन किया और बताया कि बाजार चढ़ रहा है इसलिए मुझे शेयर खरीदने चाहिए। मैंने कहा, 'माफी चाहता हूं, मैं फिलहाल सोना खरीदना चाहता हूं।' वह काफी खुश हुआ और उसने कहा, 'मैं आकर्षक कीमतों पर सोना खरीदने में आपकी मदद करूंगा। सोना खरीदने का सबसे सही रास्ता एनएसई पर गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड खरीदना है। यह किसी भी दूसरे शेयर खरीदने जितना आसान है।' उस दिन शाम में मैं इस बारे में सोच रहा था कि कच्चे तेल, महंगाई दर और सोने का रिश्ता निवेश से जुड़े फैसलों के लिए कितना महत्वपूर्ण है। सोना खरीदना और बिना चिंता के उसे अपने पास रखना कितना आसान है। खास तौर से ऐसे वक्त में जब कच्चे तेल के दाम बढ़ रहे हों, महंगाई दर परेशान कर रही हो और शेयर बाजार गर्त में जा रहे हों।
आप सोचिये वह दोस्त कौन है और वह डीलर कौन हो सकता है?

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नज़रों का फर्क

>> Friday, August 1, 2008

एक गुरुकुल में दो राजकुमार पढ़ते थे। दोनों में गहरी मित्रता थी। एक दिन उनके आचार्य दोनों को घुमाने ले गए। घूमते हुए वे काफी दूर निकल गए। तीनों प्राकृतिक शोभा का आनंद ले रहे थे। तभी आचार्य की नजर आम के एक पेड़ पर पड़ी। एक बालक आया और पेड़ के तने पर डंडा मारकर फल तोड़ने लगा। आचार्य ने राजकुमारों से पूछा, 'क्या तुम दोनों ने यह दृश्य देखा?' ' हां गुरुदेव।' राजकुमारों ने उत्तर दिया। गुरु ने पूछा, 'इस दृश्य के बारे में तुम दोनों की क्या राय है?' पहले राजकुमार ने कहा, 'गुरुदेव मैं सोच रहा हूं कि जब वृक्ष भी बगैर डंडा खाए फल नहीं देता, तब किसी मनुष्य से कैसे काम निकाला जा सकता है। यह दृश्य एक महत्वपूर्ण सामाजिक सत्य की ओर इशारा करता है। यह दुनिया राजी-खुशी नहीं मानने वाली है। दबाव डालकर ही समाज से कोई काम निकाला जा सकता है।' दूसरा राजकुमार बोला, 'गुरुजी मुझे कुछ और ही लग रहा है। जिस प्रकार यह पेड़ डंडे खाकर भी मधुर आम दे रहा है उसी प्रकार व्यक्ति को भी स्वयं दुख सहकर दूसरों को सुख देना चाहिए। कोई अगर हमारा अपमान भी करे तो उसके बदले हमें उसका उपकार करना चाहिए। यही सज्जन व्यक्तियों का धर्म है।' यह कहकर वह गुरुदेव का चेहरा देखने लगा। गुरुदेव मुस्कराए और बोले, 'देखो, जीवन में दृष्टि ही महत्वपूर्ण है। घटना एक है लेकिन तुम दोनों ने उसे अलग-अलग रूप में ग्रहण किया क्योंकि तुम्हारी दृष्टि में भिन्नता है। मनुष्य अपनी दृष्टि के अनुसार ही जीवन के किसी प्रसंग की व्याख्या करता है, उसी के अनुरूप कार्य करता है और उसी के मुताबिक फल भी भोगता है। दृष्टि से ही मनुष्य के स्वभाव का भी पता चलता है।' गुरु ने पहले राजकुमार से कहा, 'तुम सब कुछ अधिकार से हासिल करना चाहते हो जबकि तुम्हारा मित्र प्रेम से सब कुछ प्राप्त करना चाहता है।'

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सफलता की कुंजी

>> Wednesday, July 23, 2008

फोर्ड मोटर के मालिक हेनरी फोर्ड दुनिया के चुनिंदा धनी व्यक्तियों में शुमार किए जाते थे। उनकी गाड़ी की प्रशंसा दुनिया भर में होती थी। एक बार एक उद्योगपति मोटर कारखाना लगाने से पहले फोर्ड से सलाह करने अमेरिका गए। उद्योगपति ने अमेरिका पहुंच कर हेनरी फोर्ड से मिलने का समय मांगा। फोर्ड ने कहा, 'दिन में आपके लिए मैं ज़्यादा समय नहीं निकाल पाऊंगा, इसलिए आप शाम छह बजे आ जाइए।' उद्योगपति उनके घर पहुंचे। वहां एक आदमी बर्तन साफ कर रहा था। उन्होंने उससे कहा, 'मुझे हेनरी साहब से मिलना है।' वह आदमी उन्हें बैठक में बैठा कर अंदर चला गया। थोड़ी देर बाद उसने उनके सामने आकर कहा, 'तो आप हैं वह उद्योगपति। मुझे हेनरी कहते हैं।' उद्योगपति को असमंजस में देख कर हेनरी ने कहा, 'लगता है आपको मेरे हेनरी होने पर संदेह हो रहा है।' उद्योगपति ने सकपका कर कहा, 'हां सर, अभी आप को एक नौकर का काम करते देख कर ताज्जुब हुआ। इतनी बड़ी कंपनी के मालिक को बर्तन साफ करते हुए देख कर किसी को भी भ्रम पैदा हो सकता है। यह काम तो नौकरों का है।' हेनरी ने कहा, 'शुरुआत में मैं एक साधारण इंसान था। अपना काम खुद करता था। अपने हाथ से किए गए कठोर परिश्रम का फल है कि आज मैं फोर्ड मोटर का मालिक बना हूं। मैं अपने अतीत को भूल न जाऊं और मुझे लोग बड़ा आदमी न समझने लगें, इसलिए मैं अपने सभी काम अपने हाथ से करता हूं। अपना काम करने में मुझे किसी तरह की शर्मिन्दगी और झिझक महसूस नहीं होती।' उद्योगपति उठ कर खड़े हो गए और बोले, 'सर, अब मैं चलता हूं। मैं जिस मकसद से आपके पास आया था, वह एक मिनट में ही पूरा हो गया। मेरी समझ में आ गया कि सफलता की कुंजी दूसरों पर भरोसा करने में नहीं अपने पर भरोसा करने में है।'

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योग्यता की परख

एक राजा के पास दो व्यक्ति आए और बोले, 'महाराज, हम नौकरी की तलाश में आए हैं। कोई काम मिल जाए तो कृपा होगी।' राजा ने उन दोनों को अलग-अलग बागों की रखवाली का काम दे दिया। एक दिन राजा अपने मंत्री के साथ एक बाग में गए। उसकी रखवाली करने वाले का नाम था - झूमर सिंह। उसने राजा और मंत्री का स्वागत किया और उनके लिए बाग से आम तोड़ लाया। राजा और मंत्री ने आम खाने शुरू किए, लेकिन जल्दी ही थूक दिए। आम बेहद खट्टे थे। यह देख झूमर सिंह डर गया। उसे लगा राजा उसे दंडित करेंगे, लेकिन राजा ने कुछ नहीं कहा और चुपचाप मंत्री के साथ दूसरे बाग में चले गए। उसकी रखवाली अभयमल कर रहा था। उसने राजा और मंत्री को देखते ही उनके सामने थाल में आम सजाकर रख दिए और बोला, 'ये आम सभी बागों से ज़्यादा मीठे और स्वादिष्ट हैं। आप इन्हें खाकर प्रसन्न होंगे।' आम वास्तव में बहुत मीठे थे। राजा और मंत्री ने खूब आम खाए। फिर दोनों राजमहल लौट आए। दूसरे दिन राजा ने दोनों रखवालों को राजमहल बुलाया। उन्होंने अभयमल से कहा, 'आज से तुम दोनों बागों की रखवाली करोगे।' अभयमल खुश हो गया। इसके बाद राजा ने अपने गले का हार झूमर सिंह के गले में डालते हुए कहा, 'आज से तुम मेरे खजांची नियुक्त किए जाते हो।' झूमर सिंह भौचक रह गया। मंत्री को भी यह अटपटा लगा। वह तो सोच रहा था कि झूमर सिंह को सज़ा मिलेगी पर हुआ एकदम उलटा। उसने कुछ दिनों के बाद राजा से साहस करके इस बारे में पूछा। राजा ने मुस्कराते हुए कहा, 'झूमर सिंह ने जिस बाग की रखवाली की, उसका एक आम भी उसने स्वयं नहीं चखा। इसी कारण उसे पता नहीं था कि आम खट्टा है या मीठा। जबकि अभयमल ने आम चख लिया था, इसलिए उसे पता था कि आम मीठा है। मुझे लगता है कि झूमर सिंह ज्यादा ईमानदार है। इसलिए मैंने उसे खजांची बनाया।'

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लूट का जरिया हैं स्पैम मेल्स

>> Thursday, April 24, 2008

ई-बॉक्स में आ रही ज्यादातर ई-मेल्स में स्पैम होता है। स्पैम से बिजनेस करने वालों की होड़ मची है, जिसमें एशियन कंट्रीज अब पीछे नहीं हैं। कैसे ई-मेल्स में आने वाला स्पैम खतरनाक साबित हो सकता है।
ई-मेल के जरिए पैसा कमाना अब कंप्यूटर प्रोफैशनल्स के बाएं हाथ का खेल है। दिनरात कंप्यूटर से जूझने वालों ने पैसा कमाने का आसान रास्ता स्पैम को बनाया है। हाल ही में एक निजी कंपनी को जी-मेल के जरिए स्पैम ई-मेल भेजी गई। जी-मेल का नाम देखते हुए इस ई-मेल पर विश्वास करके कंपनी के ऑनर ने सब डीटेल्स दे डालीं और जब तक उन्हें कुछ पता चल पाता तो बहुत देर हो चुकी थी। यह किस्से दुनिया भर में बढ़ रहे हैं।
ज्यादातर ऑनलाइन शॉपिंग करने वाले यूजर्स भी स्पैमर्स का बिजनेस बढ़ा रहे हैं। कंप्यूटर प्रोफैशनल्स के मुताबिक इसीलिए अब यूजर्स को खुद ही अलर्ट होकर क्लिक करने की जरूरत है।
92.3 यह कोई एफएम फ्रिक्वैंसी नहीं बल्कि वो आंकड़ा है, जो स्पैमर्स की सक्सैस रेट बताता है। इस वक्त इन बॉक्स में आ रही 92.3 प्रतिशत मेल्स स्पैम होती हैं। हाल ही में सोफो कंपनी ने अपनी बाई-एनुअल रिपोर्ट पेश की। इस रिपोर्ट के मुताबिक यूएस दुनिया भर में सबसे ज्यादा स्पैम फैला रहा है। 15.4 प्रतिशत स्पैम यूएस द्वारा भेजी जाती हैं, वहीं रशिया 7.4 प्रतिशत स्पैम के लिए जिम्मेदार है। इस दौड़ में अगर कांटीनेंट्स की बात की जाए तो एशिया के स्पैमर्स 34.3 प्रतिशत स्पैम इन बॉक्स में भेज रहे हैं, वहीं यूरोप 30.7 प्रतिशत और नार्थ अमेरीका 18.9 प्रतिशत से इस खेल में शामिल है।
स्पैम भेजकर जहां एक तरफ शरारती दिमाग पैसे कमा रहे हैं, वहीं ये यूजर्स के लिए परेशानी का सबब बन रहा है। इन-बॉक्स में आने वाली कई मेल्स फेक होती हैं और साथ ही उनमें स्पैम होता है, जो कंप्यूटर और डाटा दोनों को नुकसान पहुंचाता है। इसीलिए ई-मेल सर्विस देने वाली वैबसाइट्स को सिक्योरिटी बढ़ाने की जरूरत है।
हालांकि स्पैम की रिपोर्ट करने के लिए हर ई-मेल सर्विस प्रोवाइडर रिपोर्ट एस स्पैम की ऑप्शन देता है, लेकिन फिर भी स्पैमर्स इनसे बचते हुए अपना काम कर रहे हैं। ज्यादातर स्पैम में याहू, जी-मेल और रैडिफमेल जैसे डोमेन नाम का होने के कारण यूजर्स इन्हें इग्नॉर नहीं कर पाते हैं।
ई-मेल ग्रुप्स के साथ सबसक्राइब करने वाले यूजर्स को भी स्पैम का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा ज्यादातर स्पैम कैनेडियन फारमेसी, लॉटरी, विन ए ट्रिप, सॉफ्टवेयर इंफॉरमेशन के नाम से भी भेजे जाते हैं। यह सब भी विदेशों में लूटा का जल बने हुए हैं, जो हर दिन नए शिकार फंसाते हैं।
जिन ई-मेल को रिपोर्ट ऐसे स्पैम करते हैं वो स्पैम फोल्डर में जाती है। यूजर्स को किसी भी अंजान ई-मेल आईडी से आई ई-मेल पर विश्वास नहीं करना चाहिए। स्पैम से भी कंप्यूटर में वायरस आ सकता है।

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बाल ठाकरे को एक बिहारी की चिट्ठी

>> Saturday, March 8, 2008

बालासाहब जी ,
पाए लागूं।

हम बिहारी राजनीति को लेकर काफी इमोशनल होते हैं और मैं भी कुछ अलग नहीं हूं। इसलिए जिस उम्र में बड़े-बड़े शहरों के बच्चे फिल्म और कार्टून से मनोरंजन करते रहे होंगे , मैं नेताओं के बयानों और उनके मायने ढूंढ़ने में उलझा रहता था क्योंकि मुझे लगता था कि नेता ही देश का भविष्य हैं। राजनीति के साथ प्रेम परवान चढ़ने के दौर में आप कब मेरे नायक बने , मुझे खुद भी नहीं पता चला। अबोध मन में आपके लिए इतनी इज़्ज़त क्यों थी , आज की तारीख में ठीक-ठीक बताना मुश्किल है। लेकिन शायद इसकी वजह यह रही होगी कि जिस दौर में मैं राजनीति समझ रहा था उस दौर में आप मुझे देश और हिंदू समाज के नायक लगते थे।
जैसे-जैसे राजनीति , देश , समाज और व्यवस्था की समझ बढ़ती गई , आप लगातार नायक से खलनायक के पाले में जाते दिखाई दिए। पहले आप देश को हिंदू और मुसलमानों में बांटने की राजनीति कर रहे थे और मैं हिंदू होने के कारण आपके साथ था। लेकिन फिर आप हिंदुओं को भी मराठी-गैरमराठी में बांटने लगे और मुझे लगा कि तो आपको हिंदुओं से कोई लेना-देना है ही हिंदुस्तानियों से। आज मुझे समझ में रहा है कि आपको सिर्फ अपने वोट बैंक से मतलब है और उसके लिए आप किसी को भी विलेन बता सकते हैं - चाहे वह आपका भतीजा ही क्यों हो !
आज जब मैं पहले की तरह बच्चा नहीं रहा तो मैं यह भी सोचता हूं कि कोई ऐसा व्यक्ति किसी राष्ट्र या समाज का नायक कैसे हो सकता है , जो उसको कई हिस्सों में तोड़ने की सियासत कर रहा हो। हालांकि , यह पहली बार नहीं है जब आप और आपकी पार्टी ने भौगोलिक आधार पर देश के किसी खास हिस्से के लोगों को निशाना बनाया हो। लेकिन इस बार बात दूर तलक निकल पड़ी है।
आप मानते हैं कि एक बिहारी , सौ बीमारी। वैसे यह विचार आपके अकेले के नहीं हैं। बिहारी शब्द देश के ज्यादातर हिस्सों में हिकारत का भाव दिखाने का प्रतीक बन गया है। हालांकि , आज सिर्फ वही बिहारी नहीं हैं जिनकी जड़ें बिहार में हैं। दिल्ली और मुंबई में मजदूर , कारीगर , मूंगफलीवाला , गुब्बारेवाला और वे सब बिहारी हैं जिनकी समाज में कोई ' हैसियत ' नहीं है।
आपका और आपके भतीजे राज ठाकरे का आरोप है कि बिहार और पूर्वी यूपी के लोग मुंबई में रहकर मराठी संस्कृति पर हमला बोल रहे हैं। ठाकरे जी , आपने कभी गणेश चतुर्थी पर मुंबई के पूजा मंडपों में जमा होनेवाली भीड़ में शामिल यूपी और बिहार के लोगों की गिनती की होती तो आपको पता चलता कि आपका आरोप कितना गलत हैं। जैसे कलकत्ता में रहनेवाला हिंदीभाषी दुर्गा पूजा में सारे परिवार के साथ पंडाल-पंडाल घूमते हैं , वैसे ही हम भी जहां रहते हैं , वहां के तीज-त्योहारों से खुद को कैसे अलग कर सकते हैं !
लेकिन इसके साथ यह भी सच है कि हम अपनी संस्कृति से भी उतना ही प्यार करते हैं और हम उसे भुलाना भी नहीं चाहते। इसीलिए जब छठ पूजा होती है तो हम उसे भी पूरी निष्ठा के साथ मनाते हैं। आपको और आपके भतीजे को इस पर एतराज है जो कि मुझे समझ में नहीं आता। ठाकरे जी , अगर आप अमेरिका चले जाएं तो क्या आप वहां गणेश चतुर्थी के दिन उत्सव नहीं मनाएंगे ? अगर आप और आपकी ही तरह सारे मराठी महाराष्ट्र से बाहर भारत में और विदेश में कहीं भी अपने पर्व और त्योहारों को धूमधाम से मना सकते हैं ( और मनाना भी चाहिए ) तो बाकी लोगों पर पाबंदी क्यों ? अगर आपके ही तर्क मान लिए जाएं तो फिर मराठियों को भी राज्य से बाहर गणेश चतुर्थी नहीं मनानी चाहिए। क्या ठाकरे जी , आप भी कैसी बात करते हैं , वह भी उस देश में जिसका मिजाज़ यही है कि आप छठ पूजा में शरीक हों और हम गणपति बप्पा मोरया के नारे लगाएं। हम ईद में शरीक हों और हमारे मुस्लिम भाई दीवाली में। यह ऐसा देश है जहां हिंदू घरों में भी क्रिसमस पर केक खाया जाता है।
बालासाहब जी , हम मानते हैं कि हमारे नेता करप्ट हैं। लेकिन करप्ट नेता कहां नहीं हैं ? अगर अन्ना हज़ारे से पूछें तो शायद वह एक लंबी लिस्ट निकाल देंगे महाराष्ट्र के ऐसे नेताओं की। आप भी कांग्रेसी नेताओं पर भ्रष्ट होने के आरोप लगाते रहते हैं। वैसे भी आप राजनीति में लंबे समय से है , आपको क्या बताना कि इस हमाम में सभी नंगे हैं। रही बात जहालत की और समस्याओं की तो गरीबी और अन्याय अगर बिहार में है तो क्या महाराष्ट्र में नहीं ? आत्महत्या कहां के किसान कर रहे हैं ? क्या उनकी आत्महत्याओं के लिए भी बिहारी ही दोषी हैं ?
मैं बिहार की वकालत नहीं कर रहा। बिहार में समस्याएं हैं। वे सुलझेंगी या नहीं या कितनी जल्दी या देर से सुलझेंगी , यह कहना मुश्किल है। पूंजी निवेश , उद्योग , बाज़ार और रोज़गार के मौके मिलेंगे तो यही बिहार चमचमा जाएगा और सारे पूर्वाग्रह खत्म हो जाएंगे। जब देश के दूसरे हिस्सों के लोग मोटी तनख्वाह पर कॉरपोरेट नौकरी के लिए बिहार जाएंगे तो सच मानिए , बिहार और बिहारी उतने बुरे नहीं लगेंगे।


आपका एक बिहारी

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