सत्संग
>> Friday, December 25, 2009
शिष्य जब आश्रम छोड़कर जाते थे, तो उनमें से कोई एक पेशे में जाता था, कोई दूसरे में। अपने पेशे, अपने कामकाज से जिसे जो कमाई होती थी, उसमें से वे श्रद्धापूर्वक कुछ हिस्सा उन्हें दे दिया करते थे। एक बार गुरुकुल में एक सीधा-सादा शिष्य आया। वह साधारण गृहस्थ था। दिन भर मेहनत करके अपने परिवार का पालन- पोषण करता था। लेकिन ऋषि जब उसे पढ़ाते थे, तब उसको जो भी सबक देते, अगले दिन वह उसे जरूर पूरा करके लाता था। जो कुछ उसे सिखाया जाता था, उस पर पूरे मनोयोग से अमल करता था। जब उसकी शिक्षा पूरी हुई तो उसने भी गुरु से पूछा, दक्षिणा में क्या दूं? ऋषि ने उससे भी यही कहा कि दुनिया में जाओ, जो सीखा है, उस पर अमल करो और फिर एक साल बाद जो चाहो, वह दे जाना। गृहस्थ चला गया।
एक साल बाद वह भी गुरु के पास लौटा और श्रद्धा से बोला, दक्षिणा देने आया हूं। ऋषि उसे देख कर बड़े खुश हुए। हाल-समाचार जानने के बाद पूछा, क्या लेकर आए हो बेटा?
गृहस्थ ने दस लोगों को खड़ा कर दिया, जो उसके गांव के थे। फिर बोला, मैं गुरु दक्षिणा में ये दस नए शिष्य लाया हूं। ऋषि ने पूछा, दस लोग किसलिए? तो उसने कहा, जो शिक्षा आपने मुझे दी थी, मैंने उसे इन तक पहुंचाया। उतने से ही इनका जीवन संवर गया। अब आप गुरु दक्षिणा में इन सबको अपना शिष्य बना लें, ताकि इतने लोग और आपके बताए रास्ते पर सही तरीके से चल सकें। ऋषि बहुत खुश हुए और कहा, तुमने मुझे सबसे अच्छी गुरु दक्षिणा दी है।
हम भी जब किसी सत्संग में जाते हैं, तो समझ नहीं पाते कि हम वहां से क्या पाने आए हैं। बहुत से लोग सत्संग में इसलिए जाते हैं ताकि उनके सांसारिक कष्ट दूर हो जाएं। किसी के शरीर में कष्ट है, किसी के घर में समस्याएं चल रहीं है, कहीं पति- पत्नी की नहीं बन रही है, तो कहीं मां- बाप या भाई-भाई में झगड़े हो रहे हैं। कोई अपना बिजनेस बढ़ाने के लिए आता है, कोई संतान की कामना रखता है। हम सब सोचते है कि सत्संग में जाएंगे, किसी महापुरुष के पास जाएंगे, तो हमारी इच्छाएं पूरी हो जाएंगी। पर वहां हमें बार- बार यही समझाया जाता है कि अपने आप को जानो। हम यह सुनते हैं, बार- बार सुनते हैं। लेकिन इसका मतलब समझने की कोशिश नहीं करते। उस पर अमल नहीं करते।
बहुत से भाई- बहन दान या 'नाम' की चाहत में जाते हैं। उन्हें लगता है कि संत जी से नाम ले लिया और सारे दुखों का निवारण हो गया। लेकिन भजन या जाप के लिए वे समय नहीं निकालते। पहले की ही तरह सांसारिक भौतिक चीजों में धंसे रहते हैं।
उपर दी गई कथा में वह गृहस्थ जानता था कि उसके गुरु दूसरों में क्या बांटना चाहते हैं। साधारण जन जब सत्संग में जाते हैं तो यह नहीं जानते कि वहां संत उन्हें क्या देना चाहते हैं। वह तो उनसे केवल अपने मन की चीजें पाना चाहते हैं।
छत्तीसगढ भारत का अंग है या नहीं?
>> Monday, July 13, 2009
जोश18
देवी-देवता नहीं गांधी को पूजते हैं ग्रामीण
>> Monday, March 16, 2009
इंदौर में बनी थी गांधी जी की घड़ी
>> Monday, March 9, 2009
अमेरिका में नीलामी के चलते राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पांच निशानियां इन दिनों चर्चा में हैं। इनमें एक जेब घड़ी भी शामिल है, जो इंदौर में बनी थी। घड़ी निर्माता एम. एम. कस्तूरे ने 11 जून 1947 को यह घड़ी गांधी जी को भेंट की थी।
स्वर्गीय कस्तूरे के पुत्र मुकुंद कस्तूरे ने रविवार को यहां बताया कि उनके पिता को घड़ी बनाने में महारत हासिल थी। उन्होंने इंदौर में 'उद्यम' नाम से घड़ियां बनाने का कारखाना शुरू किया था। स्वाधीनता संग्राम के दौरान स्वदेशी आंदोलन से प्रेरित होकर कस्तूरे ने पहली जेब घड़ी बनाई जो शायद देश की पहली हस्तनिर्मित घड़ी थी। उन्होंने यह घड़ी महात्मा गांधी को 1935 में उस वक्त दिखाई थी, जब वह मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति द्वारा आयोजित हिंदी सम्मेलन में भाग लेने इंदौर आए थे।
60 वर्षीय मुकुंद कस्तूरे ने बताया कि हिंदी अंकों वाली यह पहली हस्तनिर्मित घड़ी थी। गांधी जी जिस घड़ी को कमर में लटका कर रखते थे, वह 1947 में पटना से दिल्ली जाते वक्त खो गई थी। यह खबर अखबारों के जरिए जब उनके पिता को पता चली तो उन्होंने गांधी जी को इंदौर से दिल्ली टेलीग्राम कर अपने ट्रेडमार्क उद्यम की घड़ी उन्हें भेंट करने की इच्छा जाहिर की।
मुकुंद ने बताया कि उनके पिता की यह इच्छा 11 जून 1947 को पूरी हो गई जब उन्होंने चांदी के केस में जेब घड़ी और एक हस्तनिर्मित टेबल घड़ी बापू को भेंट की। इस घड़ी के अंक हिंदी में थे। बापू की शहादत के दिन 30 जनवरी 1948 तक यही घड़ी उनके पास थी।
source :daily jagran, Indore edition
Read more...घड़ी कमर में लटकाऊंगा.. मैं गांधी बन जाऊं
>> Friday, March 6, 2009
बचपन में पाठ्य पुस्तक में एक कविता पढ़ी थी, “मां खादी की चादर दे दे , मैं गांधी बन जाऊं।” कविता में एक बच्चा मां से गांधी जी के जैसी वस्तुएं दिलवाने की मनुहार करता है ताकि वह भी उन्हें लेकर गांधी जी जैसा दिख सके। उसमें गांधी जी की मशहूर घड़ी का जिक्र था। गांधी जी घड़ी हाथ में नहीं बांधते थे, कमर में लटकाते थे। “घड़ी कमर में लटकाऊंगा…” तब बाल मन के लिए गांधी जी आदर्श थे, उनकी तरह कमर में घड़ी बांधने की उत्सुकता होती थी। आज वही घड़ी तस्वीर में देखने को मिल रही है क्योंकि उसकी अमेरिका में नीलामी हुई है। क्या आपको वह पूरी कविता और लेखक का नाम याद है? मां खादी की चादर दे दे, मैं गांधी बन जाऊं घड़ी कमर में लटकाऊंगा सैर सवेरे कर आऊंगा मुझे रुई की पोनी दे दे तकली खूब चलाऊं मां खादी की चादर दे दे, मैं गांधी बन जाऊं
कविता कुछ इस प्रकार थी:-
सब मित्रों के बीच बैठ कर रघुपति राघव गांऊ
ईमेल फ्रॉड
>> Wednesday, January 21, 2009
आप लॉटरी में लाखों डॉलर के इनाम जीत गए हैं, पर इसे पाने के लिए आपको कुछ पैसे भेजने होंगे। इस तरह के ईमेल अब बीते दिनों की बातें हो गई हैं। ईमेल के जरिये फ्रॉड के अब ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिससे निपटने में सिक्युरिटी एक्सपर्ट भी नाकाम नजर आ रहे हैं।
हाल ही में एक कॉलेज स्टूडेंट के पास उसके दोस्त का मेल आया। मेल में इस स्टूडेंट के दोस्त ने कहा था कि उसका वॉलेट गुम हो गया है और उसे करीब 8 हजार रुपये की सख्त जरूरत है। इस मेल में उस स्टूडेंट के दोस्त का डिजिटल सिग्नेचर भी था। पर जब स्टूडेंट ने दोस्त को फोन लगाया तो उसे पता चला कि उसके दोस्त ने ऐसा कोई मेल ही नहीं भेजा है।
ईमेल के जरिये इस तरह फ्रॉड की घटनाएं और ऐसी कोशिशें तेजी से बढ़ रही हैं। यदि आप सोचते हैं कि आप इसका शिकार नहीं हो सकते हैं, तो आप गलत हैं।

