Right Wrong(सही गलत)

>> Saturday, September 27, 2014

सही गलत

सरकार की अगर कोई नीति बरसों बाद आदालत के निर्देश पर खारिज होती है। या फिर सरकार को बीते बरसों के फैसले रद्द करने पड़ते हैं तो फिर जिन निवेशकों ने सरकारी नीति के तहत पूंजी लगायी वह अब क्या करेंगे। जिन बैकों ने प्लांट के लिये कंपनियो को उधारी दी अब उन्हें वापस पैसा कैसे मिलेगा? और जिन्होने कोयला खादान मिलने पर उद्योग लगा लिया उनकी पूंजी का क्या होगा?

याद कीजिये, जब तत्कालीन सरकार ने निजी फर्मों को खदाने तभी आबंटित की थी. जब सरकारी उपक्रम कोल  इंडिया ने उन खदानों को नकार दिया था. तब निजी उद्योगों ने अपने दम पर खतरे उठाकर वहाँ खदाने शुरू की, करोड़ों रूपये लगाकर संसाधन विकसित किये. और जब अब यह मुनाफा सभी को दिखने लगा तो यकायक यह काम गैरकानूनी हो गया.
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय सर्वोपरि है, पर क्या किसी ने यह जहमत उठाने की कोशिश की कि जिन नीति के अनुसार इन खदानों का आबंटन हुआ, उस नीति का पालन इन उद्योगों ने किया या नहीं. अगर कोई उद्योग इन नीति का पालन नहीं करता तब उनका आबंटन रद्द कर दिया जाना चाहिए पर अगर किसी ने उस नीति का पालन किया है तो स्तिथि यथावत रहनी चाहिए. क्योंकि उस उद्योगों ने उस नीति के अनुसार ही आबंटन पाया और अपना उद्योग चलाया. हाँ अगर वह नीति ही गलत है तो फिर इसमें उद्योग कि गलती कहाँ है. यह तो नीति निर्धारण करने वालों कि गलती है फिर इसकी सजा नीति पालन करने वाले उद्योगों को क्यों?

पूंजीपति उद्योगपतियों को सरकार की नीति से लाभ होता है तो ही वह पैसा लगाते हैं(ध्यान रहे कि हर उद्योगपति एक व्यापारी होता है और अपना नफा-नुकसान देखकर ही पैसा लगता है) और जब नीतियां ही फ्रॉड साबित हो जाये तो फिर विकास की नयी नीति के विरोध में खड़े होने से भी नहीं कतराते। इसलिये यह मैं समझ नहीं पा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पावर प्रोजेक्ट के लिये दिये गये करोड़ों रूपये के लोन का बैक को चूना लगेगा। कंपनियो को करोड़ों का नुकसान होगा। तो फिर यह हालात आये कैसे और कैसे विकास की लहर में भारत खुला बाजार बन गया।
अब जब सुप्रीम कोर्ट ने खादान आवंटन को गलत मान कर हर आवटंन रद्द कर दिया है तो फिर इसके दोषियों को क्या सजा होगी । क्या कोई जेल जायेगा ? क्योकि हर निर्णय ग्रूप आफ मिनिस्टर ने लिये । यानी सरकारें की अपराध कर रही थी तो फिर आने वाले वक्त में कौन यह मान कर चले कि अभी जो विकास की चकाचौंध विदेशी-देशी निवेश से दिखायी जा रही है कल वह भी गलत साबित नहीं होगी। यानी मोदी सरकार की नीतिया भी 2035 में गलत साबित हो सकती है । तो फिर इस देश में कौन पैसा लगायेगा.

कोर्ट का कहना है कि जिन उद्योगों ने आबंटन पाया है और कोयला निकला है उन्हें अब पेनाल्टी देना होगा, वह भी प्रति टन के हिसाब से. मेरा एक सामान्य सा प्रश्न है:
  1.     कुछ साल पहले मैंने एक सामान(मान लें प्लाट) बाज़ार से लिया. लेते समय उसकी जितनी कीमत थी मैंने चुकाई और सरकार को उस कीमत की टैक्स भी दी. अब उसकी कीमत में उछाल आ गया और वह मंहगा हो गया. तो क्या बेचने वाला मुझसे अभी की बढ़ी हुई दर की भरपाई के लिए दावा कर सकता है. और साथ ही साथ सरकार भी क्या बढ़ी हुई कीमत पर टैक्स मांग सकती है? अगर हाँ तो :
  2.       कुछ  साल पहले मैंने यही सामान लिया था, अब उसकी कीमत गिर गई. क्या मैं आज इसके बाजार भाव के कीमत की वापसी का दावा बेचने वाले से और सरकार से इसके टैक्स की वापसी का दावा कर सकता हूँ? क्योंकि मैंने उस समय इसकी ज्यादा कीमत चुकाई थी.


 * यह मेरे निजी विचार हैं...

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Traveled in Stated of INDIA

>> Monday, February 18, 2013


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Thank You

>> Tuesday, June 5, 2012

Thank You All.....















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Handling Office Document on BlackBerry Device

>> Saturday, March 12, 2011

Documents to Go is a suit of software which contains a word processor, spreadsheet, presentation and PDF viewer. You won't be able the get these software unless you buy them.
But a free version of documents to go is bundled in the Blackberry OS 4.5 onwards. The free version if you don't already have them contains only Word to Go and SlideShow to Go but the missing feature is that it does not covers Sheet to Go(SpreadSheet). Bellow are some instructions on how to get Sheet to Go (Spreadsheet).
  1. Upgrade your phones OS to 4.5
  2. The upgrade should install Documents to Go, now you need to upgrade it to get Sheet to Go from your Handset.
  3. Click on documents to Go and click on word to Go. Click on the menu key and look for the update option.
  4. It will now force you to register, if you wish you can register free to get future benefits like upgrade offers, newsletters.
  5. Download & Install the Updated Software from site(approx 3mb).
  6. Lastly to avoid your Desktop Manager from reverting your upgrade to your old version of Documents to navigate to C:\Program Files\Common Files\Research In Motion\Shared\Loader Files\Your_Device_Folder.
  7. Rename DocumentsToGo.alx to DocsToGo.old.
  8. Make a Backup of your Device for Future Use.
Now you're able to Use Spreadsheet Feature with your BlackBerry.

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जो लोग वाकई में देश के बारे में सोचते हैं वे आगे बढ़ कर कुछ करते हैं..

>> Monday, January 24, 2011

जो लोग वाकई में देश के बारे में सोचते हैं और उसके लिये आगे बढ़ कर कुछ करते हैं वे देश की निंदा नहीं करते। ऐसे लोग निंदा की बजाये आशा और कर्म में विश्वास रखते हैं।
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एक बार स्वामी रामतीर्थ जापान गए। एक लंबी रेल यात्रा के बीच उनका फल खाने का मन हुआ। गाड़ी एक स्टेशन पर रुकी पर उन्हें वहां फल नहीं मिले। उनके मुंह से निकल गया, “जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते।

एक सहयात्री जापानी युवक ने उनके यह शब्द सुन लिए। अगले स्टेशन पर वह तेजी से उतरा और कहीं से एक टोकरी में ताजे मीठे फल ले आया और उसे स्वामी रामतीर्थ की सेवा में प्रस्तुत करते हुए बोला, “लीजिए आपको इसकी ज़रूरत थी

स्वामी जी ने उसे फलवाला समझकर पैसे देने चाहे लेकिन उसने पैसे नहीं लिए।

स्वामी जी के बहुत आग्रह करने पर उस जापानी युवक ने कहा, “स्वामी जी, इसकी कीमत यही है कि आप अपने देश में किसी से यह न कहें कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।

स्वामी रामतीर्थ युवक का यह उत्तर सुनकर मुग्ध हो गए।
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धन्यवाद ललित जी,अच्छी कहानी के लिए  ...


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नया साल देता है नया मौका....

>> Monday, January 3, 2011

एक और साल बीता और नए का आगमन हुआ। आखिर नए साल का कितना महत्व होता हैअगर हम कैलंडर हटा दें तो यह दिन भी वैसा ही होगा जैसे बाकी आम दिन। यानी हमारे सामने वही सब चीजें होती हैवैसा ही दिनवैसी ही रातवही घर और वही बिस्तर। कुछ घंटे और कुछ सेकंड्स के अंतर पर भौतिक रूप से चीजें नहीं बदलतीं। इसे दार्शनिक रूप से सोचा जाए तो बाकी पुराने दिनों की ही तरह ही यह एक  नया दिन होगा। लेकिन नए साल का एक भावनात्मक पहलू होता है। 

दरअसल इंसान एक भावनात्मक प्राणी है और अपने मानसिक धरातल पर वह एक अलग दुनिया में जीता है। इस दुनिया में रिश्ते होते हैंलोग होते हैंआदतें होती हैं और उसकी यह दुनिया बाहरी भौतिक दुनिया से एकदम अलग होती है। जैसे एक व्यक्ति जिसे आप नहीं जानतेऔर वह आपके पास से गुजरता है तो वह आपके लिए सिर्फ एक शरीर है। लेकिन उसके जीवन में झांकेंगे तो पाएंगे कि वह तो अपने साथ कितनी चीजें लिए जा रहा है। अनुभवआशाएंसपनेडरसुख-दुख और न जाने कितनी ही चीजें। यानी मानसिक रूप से इंसान एक अलग जिंदगी जीता है।

दरअसल नए साल की परिकल्पना हमारी मानसिक दुनिया को ही प्रभावित करती है। हमारी मानसिक दुनिया में हर छोटी चीज का बड़ा महत्व होता है और वहीं जन्म होता है नए रिजॉल्यूशननई प्रतिज्ञा और नए संकल्प का। अब सवाल ये है कि ये नए संकल्प हम पूरे कैसे कर सकते हैं? 

एक होटल में एक आदमी पियानो बजाता था मगर दो तीन दिन से उसकी परफॉर्मेंस बहुत ही खराब थी। होटल मालिक ने सोचा कि शायद उसकी तबियत ठीक नहीं। उसने डॉक्टर को बुलाया लेकिन सब सही था। पियानो बजाने वाले ने पियानो ट्यून किया तो भी सुर नहीं सधे। आखिर मालिक ने पूछा कि आखिर तुम्हें हुआ क्या हैइतने में ही पियानो बजाने वाले का दोस्त बोल पड़ा कि उसे कुछ मत कहिएदरअसल उसकी बेटी बीमार है। मालिक ने उसे घर जाकर बेटी का इलाज कराने को कहा। यह कहानी कहने के पीछे मेरा मकसद यह था कि जीवन में चीजें सतही तौर पर ठीक नहीं की जा सकती। जैसे पियानो को ट्यून करने से वह नहीं बजेगा बल्कि बेटी के ठीक होने से मन अच्छा होगा और तभी पियानो भी अच्छा बजेगा। यही हाल हमारे रिजॉल्यूशन का भी है। चीजों को बदलने के लिए उसके मूल तक पहुंचना जरूरी है।

हम सिगरेट और शराब छोड़ने का रिजॉल्यूशन लेते हैं लेकिन हमें यह सोचने की जरूरत है कि आखिर हम ये सब पीते ही क्यों हैंसमस्या के मूल तक पहुंचकर उसे हल करने का संकल्प लें न कि आवरण बदलने का। 

नया साल मनाने की शुरुआत रोम में हुई थी। वहां जेनस नाम के उनके भगवान हुआ करते थे और उन्हीं के नाम से जनवरी शब्द निकला। जेनस के दो मुंह थे एक आगे देखने के लिए और दूसरा पीछे देखने के लिए। मतलब नया साल शुरू करते हैं तो पुराने को अपने से एकदम काटकर उसकी शुरुआत नहीं हो सकती। नए साल के संकल्प इसलिए टूट जाते हैं क्योंकि वे जोश में लिए गए होते हैं और उत्साह कई बार क्षणिक भी होता है।

जेनस की तरह आगे देखने के साथ-साथ पीछे भी देखें। पुरानी गलतियों से सीखें फिर नए साल का संकल्प लें। हर साल हमें एक नए जीवन की नई शुरुआत करने का मौका मिलता है। यह मौका हर संस्कृति में मिलता है। गंगा स्नान भी तो यही है। गंगा में डुबकी लगाते हुए भी तो हम भविष्य में कोई पाप न करने का संकल्प लेते हैं। हर इंसान को कुछ नया पाने की इच्छा रहती है। जीवन में यदि सुधरने का मौका न मिले तो जीवन नीरस और उबाऊ हो जाएगा। नए संकल्प करने में कोई बुराई नहीं है लेकिन उन्हें फलीभूत करने की जरूरत है। ऐसे काम पूरे करने की सोचें जिन्हें अब तक आप टालते आ रहे हों। 

नए साल की हार्दिक शुभकामनाएं!
साभार-प्रसून जोशी

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How to Configure Full Internet Access On BlackBerry(Without BES)

>> Saturday, December 18, 2010

Run Internet(GPRS) on any Blackberry Device Without Subscribing BlackBerry Internet Service)

  • Run BES-required Internet software without BES!
  • Instant Messaging, AIM, ICQ, MSN (Verichat, WebMessenger, IM+, etc.)
  • Full HTML web browsing ability (Reqwireless, BlackBerry Browser, etc.)
  • IRC chatting (virca, wlirc, etc.)
  • telnet/ssh (Idokorro, etc.)
  • No BES needed! No MDS needed!
Easy 1-2-3 Instructions:
  1. Upgrade your BlackBerryOS
    You need BlackBerry with OS 3.8 or later. If you have an older version of BlackBerryOS, please download and install it on your BlackBerry first.
  2. Configure your BlackBerry APN & Your Carrier
    On the BlackBerry handheld, go to Options -> TCP
    There is a new option in BlackBerryOS 3.8 and later. Then fill in APN with the APN provided by yuor Service Provider. If no username or password is provided, leave these blank. If only a username is provided, then leave in the password. Also, ignore the Gateway IP address, unless your Blackberry specifically has a textbox to enter the IP address in. "APN" means "Access Point Name". for airtel it w'd be airtelgprs.com for BSNL it w'd be bsnlnet
  3. Run your BlackBerry Internet Software
    Once you have filled this information, your Internet applications should work on your BlackBerry. TCP/IP makes Internet software work, including chat software: Verichat, WebMessenger, IRC, Telnet/SSH, Web browsing, etc. For Web Browsing Opera is the best which runs on Socket based.
Occasionally, some applications on the BlackBerry need to have the gateway or APN information entered directly into them. This is not common.

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कृपया खाने के अपव्यय को रोकिये

>> Monday, November 22, 2010

कृपया खाने के अपव्यय को रोकिये
अगर आगे से कभी आपके घर में पार्टी / समारोह हो और खाना बच जाये या बेकार जा रहा हो तो बिना झिझके आप 1098 (केवल भारत में )पर फ़ोन करें - यह एक मजाक नहीं है - यह चाइल्ड हेल्पलाइन है । वे आयेंगे और भोजन एकत्रित करके ले जायेंगे।

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पूजा और भक्ति

>> Saturday, November 20, 2010

एक साधु एक राजा के अतिथि बने। राजा ने साधु से पूछा, 'बताएं, पूजा और भक्ति में क्या अंतर है?' साधु ने राजा को कुछ दिन प्रतीक्षा करने के लिए कहा।

एक दिन जब राजा और साधु एक साथ भोजन कर रहे थे तब राजा ने रसोइए को बुलाया और कहा, 'आज सभी सब्जियां स्वादिष्ट हैं लेकिन बैंगन की सब्जी लाजवाब है।' रसोइए ने प्रसन्न होकर कहा, 'महाराज, बैंगन तो है ही शाही सब्जी। जैसे आप शहंशाह हैं वैसे ही बैंगन भी सब्जियों का शहंशाह है।' रसोइए ने अगले दिन फिर से बैंगन की सब्जी बनाई। अब वह रोज बैंगन बनाने लगा। 
एक दिन राजा ने भोजन की थाली परे सरकाते हुए रसोइए को बुलाकर फटकार लगाई। रसोइया हाथ जोड़कर बोला, 'महाराज गलती हो गई। बैंगन तो घटिया सब्जी है। इसमें तो कोई गुण नहीं होता तभी तो इसका नाम बैंगन पड़ा। आदमी तो क्या, इसे जानवर भी नहीं खाते। अब मैं कभी इसकी सब्जी नहीं बनाऊंगा।' राजा रसोइए की बात सुनकर हैरान था। 

उसने कहा, 'अभी कुछ दिन पहले तो तुम बैंगन की तारीफ कर रहे थे और आज इसे घटिया कह रहे हो।' रसोइया तपाक से बोला, 'महाराज, मैं नौकर आपका हूं, बैंगन का नहीं।' तभी साधु ने बीच में टोकते हुए राजा से कहा, 'रसोइए ने ऐसा मेरे कहने पर किया है। यही आपके प्रश्न का उत्तर है। हम मंदिर जाकर पूजा करते हैं, करवाते है, पुजारी को दक्षिणा देते हैं। यह भक्ति नहीं है। पुजारी तो ठहरा दक्षिणा का भोगी। जैसी दक्षिणा वैसी पूजा, वैसा ही आशीर्वाद। पूजा में हमें परमात्मा की भक्ति कहां याद रहती है।' राजा को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया। 

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BSNL 3G Configuration Settings

>> Wednesday, November 3, 2010

Step 1: Send a SMS to 58355 in the following format. E.g. NOKIA E72

Step 2: You will receive 4 configuration messages which can be opened with a PIN no.

Step 3: PIN no is 1111
Step 4: Use the PIN, open the configuration message and save it.



Do the same for all messages.


Thats all.


Initially your phone will show 3G, and when you successfully configure it becomes 3.5G.


The speed is really good(1mbps).


If further assistance required, Call to BSNL Customer Care at 1503 from your mobile.

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आस्था

>> Saturday, May 8, 2010

मनौती मांगने के लिए कि गयी प्रक्रिया में हम जितना कष्ट उठाते हैं,  अगर उतना ही "संकल्प" करने में उठाएं और फिर जो निश्चय किया है उसे उसी पराक्रम से कर दिखाएं तो बेहतर होगा. लेकिन ऐसा संकल्प और ऐसा पराक्रम सभी लोग अपने अकेले बलबूते पर नहीं कर पाते. इसलिए वह अपने से बड़े किसी ऐसे शक्ति में विश्वास करके चलते हैं, जिनमें और भी अनगिनत लोगों का विश्वास हो और जो उनसे ऐसे काम करवा सकते हों; जो वे मानते हैं कि स्वयंऔर अपने बलबूते पर नहीं कर पाते या नहीं कर सकते. आपको अपने अन्दर कि असाधारण शक्ति में विश्वास करना जरूरी है.
हनुमान जी को भी कहाँ अपनी शक्ति का एहसास था कि वे समुद्र लाँघ सकते हैं, उन्हें भी अपनी शक्ति का एहसास रामजी ने कराया. हर आदमी, देश और समाज ऐसी कोई असाधारण शक्ति या आदर्श चुन लेता है और फिर खुद ही उसे पूरा करने में लग जाता है. सब अपने पराक्रम और उपलब्धि को अपने से बड़ी किसी शक्ति प्रेरणा या आदर्श को समर्पित कर देते हैं, जिनमें यह विनम्रता नहीं होती उनका पराक्रम ज्यादा दिन तक नहीं चलता क्योंकि उपलब्धि ज्यादा दिन तक टिकाऊ नहीं होती.

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सत्संग

>> Friday, December 25, 2009

पुरानी कथा है, एक ऋषि थे। आश्रम में अपने शिष्यों को वे आध्यात्मिक जीवन के बारे में बताया करते थे। जब शिष्यों की शिक्षा पूरी हो जाती थी और वे अपने घरों को वापस जाने लगते थे, तो वे ऋषि से पूछते कि गुरुदक्षिणा में क्या दें? तब ऋषि कहते कि तुमने जो पाया है, दुनिया में जाकर उस पर अमल करो, अपने पैरों पर खड़े होओ, सच्चाई की कमाई खाओ और फिर एक साल बाद तुम्हारा जो दिल चाहे वह दे जाना।

शिष्य जब आश्रम छोड़कर जाते थे, तो उनमें से कोई एक पेशे में जाता था, कोई दूसरे में। अपने पेशे, अपने कामकाज से जिसे जो कमाई होती थी, उसमें से वे श्रद्धापूर्वक कुछ हिस्सा उन्हें दे दिया करते थे। एक बार गुरुकुल में एक सीधा-सादा शिष्य आया। वह साधारण गृहस्थ था। दिन भर मेहनत करके अपने परिवार का पालन- पोषण करता था। लेकिन ऋषि जब उसे पढ़ाते थे, तब उसको जो भी सबक देते, अगले दिन वह उसे जरूर पूरा करके लाता था। जो कुछ उसे सिखाया जाता था, उस पर पूरे मनोयोग से अमल करता था। जब उसकी शिक्षा पूरी हुई तो उसने भी गुरु से पूछा, दक्षिणा में क्या दूं? ऋषि ने उससे भी यही कहा कि दुनिया में जाओ, जो सीखा है, उस पर अमल करो और फिर एक साल बाद जो चाहो, वह दे जाना। गृहस्थ चला गया।

एक साल बाद वह भी गुरु के पास लौटा और श्रद्धा से बोला, दक्षिणा देने आया हूं। ऋषि उसे देख कर बड़े खुश हुए। हाल-समाचार जानने के बाद पूछा, क्या लेकर आए हो बेटा?

गृहस्थ ने दस लोगों को खड़ा कर दिया, जो उसके गांव के थे। फिर बोला, मैं गुरु दक्षिणा में ये दस नए शिष्य लाया हूं। ऋषि ने पूछा, दस लोग किसलिए? तो उसने कहा, जो शिक्षा आपने मुझे दी थी, मैंने उसे इन तक पहुंचाया। उतने से ही इनका जीवन संवर गया। अब आप गुरु दक्षिणा में इन सबको अपना शिष्य बना लें, ताकि इतने लोग और आपके बताए रास्ते पर सही तरीके से चल सकें। ऋषि बहुत खुश हुए और कहा, तुमने मुझे सबसे अच्छी गुरु दक्षिणा दी है।

हम भी जब किसी सत्संग में जाते हैं, तो समझ नहीं पाते कि हम वहां से क्या पाने आए हैं। बहुत से लोग सत्संग में इसलिए जाते हैं ताकि उनके सांसारिक कष्ट दूर हो जाएं। किसी के शरीर में कष्ट है, किसी के घर में समस्याएं चल रहीं है, कहीं पति- पत्नी की नहीं बन रही है, तो कहीं मां- बाप या भाई-भाई में झगड़े हो रहे हैं। कोई अपना बिजनेस बढ़ाने के लिए आता है, कोई संतान की कामना रखता है। हम सब सोचते है कि सत्संग में जाएंगे, किसी महापुरुष के पास जाएंगे, तो हमारी इच्छाएं पूरी हो जाएंगी। पर वहां हमें बार- बार यही समझाया जाता है कि अपने आप को जानो। हम यह सुनते हैं, बार- बार सुनते हैं। लेकिन इसका मतलब समझने की कोशिश नहीं करते। उस पर अमल नहीं करते।

बहुत से भाई- बहन दान या 'नाम' की चाहत में जाते हैं। उन्हें लगता है कि संत जी से नाम ले लिया और सारे दुखों का निवारण हो गया। लेकिन भजन या जाप के लिए वे समय नहीं निकालते। पहले की ही तरह सांसारिक भौतिक चीजों में धंसे रहते हैं।

उपर दी गई कथा में वह गृहस्थ जानता था कि उसके गुरु दूसरों में क्या बांटना चाहते हैं। साधारण जन जब सत्संग में जाते हैं तो यह नहीं जानते कि वहां संत उन्हें क्या देना चाहते हैं। वह तो उनसे केवल अपने मन की चीजें पाना चाहते हैं।

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छत्तीसगढ भारत का अंग है या नहीं?

>> Monday, July 13, 2009

An Article Publiched in JOSH18.com dt. 13 July 2009

छत्तीसगढ भारत का अंग है या नहीं?
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13 जुलाई 2009
जोश18

रविवार 12 जुलाई को छत्तीसगढ के राजनांदगांव जिले में नक्सलियों ने एक के बाद एक तीन जाल बिछाए और हर बार पुलिसकर्मियों के एक – एक दल की निर्ममतापूर्वक हत्या कर दी।
एक ही दिन में नक्सलवादियों ने एक पुलिस अधीक्षक सहित 39 पुलिसवालों की हत्या कर दी।

देश की सुरक्षा पर यह हमला मुम्बई पर हुई आतंकवादी हमले से कम तो नहीं.. लेकिन देश में कितनी चर्चा हुई सुरक्षाकर्मियों के इस भयावह नरसंहार की?

राष्ट्रपति के पुलिस पदक से सम्मानित, छत्तीसगढ के एक पुलिस अधीक्षक सहित 39 जवान नक्सलियों द्वारा बारुदी सुरंग से उड़ा दिए गए, लेकिन राष्ट्रीय टीवी चैनल “राखी का स्वयंवर” और सलमान खान का “दस का दम” दिखाने में व्यस्त रहे।

किसी भी फिल्मी व्यक्तित्व या खिलाड़ी के विदेश में पुरस्कारी जीतते ही बधाई पत्र जारी करने वाला राष्ट्रपति भवन ने देश की रक्षा में शहीद हुए इन जवानों को लिए एक शब्द भी नहीं कहा।
मुम्बई एक महानगर है और छत्तीसगढ, ग्रामीण भारत का हिस्सा, इसीलिए नक्सलियों का यह हमला मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमले से कम है। है न?

दिल्ली में मेट्रो पुल गिरने से छह लोगों की मौत की खबर दो दिनों से छाई हुई है, इंग्लैंड- ऑस्ट्रेलिया के बीच एशेज का पहला टेस्ट ड्रॉ होने का विशेषज्ञ विश्लेषण किया जा रहा है, राखी सावंत का स्वयंवर, सलमान खान के टीवी शो में कंगना रानौत की उपस्थित और हॉलीवुड में मल्लिका शेरावत की धूम- ये सब हमारे टीवी चैनल की सुर्खियां थे, छत्तीसगढ में बारुदी सुरंग लगा कर उड़ाए गए सुरक्षाकर्मी सिर्फ चलताऊ खबर।

गृहमंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्र्पति, रक्षामंत्री चुप हैं इस हमले पर। देश के बीचोंबीच, 200 से 500 नक्सली पहले केंद्रीय सुरक्षा बलों के 10 जवानों की हत्या करते हैं, फिर उसकी जांच करने गए पुलिस दल को गाजर-मूली की तरह काट देते हैं और सरकार की तरफ से कोई एक शब्द भी नहीं बोलता।

एक युवक दो समुदायों के बीच नफरत फैलाने के लिए जहर उगलता है और सांसद बन जाता है। फिर जेड श्रेणी की सुरक्षा की मांग करता है क्योंकि कथित तौर पर उसकी जान को खतरा है। दूसरा नेता दो प्रांतों के लोगों के बीच नफरत की खाई खोद कर, सरकार से प्राप्त ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा के साये में अपनी राजनीति की दूकान चलाता है क्योंकि उसकी जान को खतरा है। ये दोनों जब मुंह खोलते हैं या अदालत जाने के लिए घर से कदम निकालते हैं तो टीवी चैनल उसके एक-एक क्षण का “लाइव” प्रसारण करते हैं।
लेकिन ग्रामीण इलाके का एक पुलिस अधीक्षक नक्सलियों द्वारा घेर कर क्रूरतापूर्वक मार दिया जाता है और उसकी चर्चा तक नहीं होती।

मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमले के दौरान एटीएस प्रमुख करकरे, एनकाउंटर स्पेशलिस्ट विजय सालस्कर और एसीपी काम्टे की आतंकवादियों के हाथों किस तरह हत्या हुई थी, उसकी बहुत चर्चा हुई थी। पढ़िए राजनांदगांव के पुलिस अधीक्षक विनोद चौबे और उनके साथियों को किस तरह घात लगा कर मारा गया:
(रिपोर्ट साभार : देशबंधु)
“मदनवाड़ा पुलिस कैम्प में दो पुलिसकर्मियों की हत्या की खबर मिलते ही आईजी मुकेश गुप्ता तथा राजनांदगांव एसपी विनोद कुमार चौबे अलग-अलग वाहनों से घटना स्थल की ओर रवाना हो गए और मानपुर पहुंचे।

मानपुर से लगभग 11 बजे एसपी चौबे पूरे दल बल के साथ वहां से लगभग 9 किलोमीटर दूर स्थित राजनांदगांव के मदनवाड़ा के लिए रवाना हो गए। मदनवाड़ा पुलिस पोस्ट से कुछ दूर पहले ही नक्सलियों ने एसपी के ड्राइवर को गोली मार दी।

इसके बाद पुलिस अधीक्षक विनोद चौबे व उनके साथ गए जवान गाड़ी से उतर गए और मोर्चा संभाल लिया।

नक्सलियों ने पुलिस दल पर चारों ओर से जबरदस्त फायरिंग शुरू कर दी। जवानों का नेतृत्व कर रहे एसपी विनोद चौबे ने काफी देर तक नक्सलियों से लोहा लेते रहे, लेकिन नक्सलियों की एक गोली एसपी चौबे के कंधे पर जा लगी और इससे पहले की वे संभलने की कोशिश कर पाते नक्सलियों ने उनपर गोलियों की बौछार कर दी।

एसपी चौबे की मौत के बाद भी जवानों ने मोर्चा संभाले रखा, लेकिन नक्सलियों ने पूरे इलाके को चारों तरफ से ऐसे घेर रखा था कि जवानों को बच निकलने का कोई रास्ता नहीं था।

पूरे इलाके पर नक्सलियों ने कब्जा कर रखा है, जिसके चलते पुलिस को बचाव करने का मौका भी नहीं मिल पाया। बताया जा रहा है कि इस वारदात में दोपहर 1 बजे तक मोहला थाना प्रभारी विनोद धु्रव व एएसआई कोमल साहू के अलावा 21 जवान शहीद हो चुके थे।

शाम होते-होते शहीद होनेवालों की संख्या बढ़कर 30 हो गई, जो देर रात तक 34 हो गई।

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक मानपुर मोहला इलाके के मदनवाड़ा, सीतागांव सहित करीब चार गांवों में नक्सलियों ने डेरा डाल रखा है।” ....
चार गांवों में नक्सलियों ने डेरा डाल रखा है लेकिन न तो राज्य सरकार, और न ही केन्द्र सरकार इस पर कुछ बोलती है।
बहादुरी के लिए राष्ट्रपति पदक से सम्मानित एक पुलिस अफसर और 39 जवानों की मौत देश को या सरकार को हिलाने वाली खबर नहीं है.. समलैंगिकों को आपसी सहमति से सेक्स-संबंध बनाने की अदालती छूट मिलने की खबर, सप्ताह भर तक दिन-दिन भर दिखाने वाले टीवी चैनलों की खबर नहीं है..।


देख कर लगता है, छत्तीसगढ़ भारत का हिस्सा है भी या नहीं? ...
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देवी-देवता नहीं गांधी को पूजते हैं ग्रामीण

>> Monday, March 16, 2009

देश के मंदिरों में जहां विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा की जाती है, वहीं उड़ीसा  के संबलपुर के भतरा गांव स्थित गांधी मंदिर में रोजाना रामधुन के साथ महात्मा गांधी की पूजा की जाती है। गांव का हर व्यक्ति मंदिर से प्रसाद लेने के बाद ही अपने काम पर जाता है। सुनने में भले ही यह आश्चर्य लगे, लेकिन यह सच है कि करीब 35 वर्षाें से भतरा गांव में यही परंपरा चली आ रही है। देश भले ही महात्मा गांधी को गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस, गांधी जयंती या शहीद दिवस पर याद करे, लेकिन भतरा गांव के लोग रोजाना महात्मा गांधी को किसी देवता की तरह याद करते है और उनकी पूजा करते हैं।
उड़ीसा के संबलपुर जिला मुख्यालय से करीब तीन किलोमीटर दूर कटक राजमार्ग से थोड़ी दूर स्थित भतरा गांव का यह गांधी मंदिर संभवत: देश का एकमात्र गांधी मंदिर है, जहां गांधी जी की कांसे की प्रतिमा सिद्धासन की मुद्रा में है। एक मीटर से थोड़ी ऊंची इस प्रतिमा को खलिकोट कला कालेज के एक कलाकार ने बनाया था जबकि मंदिर की अंदरूनी साज-सच्चा भतरा के ही तृप्तभूशण दास गुप्त ने की थी। इस गांधी मंदिर की परिकल्पना अनुसूचित जाति के नेता अभिमन्यु कुमार ने की थी। श्री कुमार जब रेढ़ाखोल से विधायक चुने गये तब उन्होंने इस परिकल्पना को साकार करने का निश्चय किया। संबलपुर के तत्कालीन राजस्व आयुक्त रवींद्र नाथ महांती ने भी विधायक उनका साथ दिया और 23 मार्च 1971 को गांधी मंदिर का शिलान्यास किया गया। करीब 11 मीटर लंबे, साढ़े छह मीटर से कुछ अधिक चौड़े और करीब 12 मीटर ऊंचे इस मंदिर को पूरा होने में तीन वर्ष लगे। तत्कालीन मुख्यमंत्री नंदिनी शतपथी ने 11 अपै्रल 1974 को इस मंदिर का उद्घाटन किया और तभी से यह गांधी मंदिर आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। वैसे महात्मा गांधी की पूजा तो रोजाना सुबह और शाम को की जाती है, लेकिन 26 जनवरी, 15 अगस्त और दो अक्टूबर को यहां विशेष पूजा की जाती है। संबलपुर जिलाधीश पहले इस मंदिर में पहुंचकर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित करते है और इसके बाद अन्य कार्यक्रमों में शिरकत करते है। भतरा गांव का यह गांधी मंदिर एक और मामले में अन्य किसी मंदिर से अलग है। दूसरे मंदिरों के समक्ष जहां गरुड़ स्तंभ होता है, वहीं इस मंदिर के सामने अशोक स्तंभ है। मंदिर में भारत माता की प्रतिमा भी है, जिसके हाथ में तिरंगा है। और तो और गांधी मंदिर की चोटी पर भी तिरंगा लहराता रहता है। करीब डेढ़ हजार की आबादी वाला यह गांव नगरपालिका के एक प्रमुख वार्ड में शामिल है, लेकिन मौलिक सुविधाओं की कमी अब भी खलती है। गांव के अधिकांश लोग अब भी पेट की आग बुझाने के लिये गांव से बाहर निकलते है। वर्ष के 365 दिनों में से केवल तीन-चार दिन ही सरकारी अधिकारी और नेताओं के यहां दर्शन होते है। इस मंदिर को लेकर एक विकास कमेटी भी बनायी गयी है, जो समाज सेवा का कार्य भी करती है। कमेटी गरीब विद्यार्थियों की सहायता भी करती है। शाम के समय गांव वाले मिल-जुलकर मंदिर में भजन-कीर्तन करते हैं। मंदिर का पुजारी अब भी स्कूली बच्चों को गांधीगिरी का पाठ पढ़ाता है ओर सब की खुशहाली की कामना करता है।

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इंदौर में बनी थी गांधी जी की घड़ी

>> Monday, March 9, 2009

अमेरिका में नीलामी के चलते राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पांच निशानियां इन दिनों चर्चा में हैं। इनमें एक जेब घड़ी भी शामिल है, जो इंदौर में बनी थी। घड़ी निर्माता एम. एम. कस्तूरे ने 11 जून 1947 को यह घड़ी गांधी जी को भेंट की थी।

स्वर्गीय कस्तूरे के पुत्र मुकुंद कस्तूरे ने रविवार को यहां बताया कि उनके पिता को घड़ी बनाने में महारत हासिल थी। उन्होंने इंदौर में 'उद्यम' नाम से घड़ियां बनाने का कारखाना शुरू किया था। स्वाधीनता संग्राम के दौरान स्वदेशी आंदोलन से प्रेरित होकर कस्तूरे ने पहली जेब घड़ी बनाई जो शायद देश की पहली हस्तनिर्मित घड़ी थी। उन्होंने यह घड़ी महात्मा गांधी को 1935 में उस वक्त दिखाई थी, जब वह मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति द्वारा आयोजित हिंदी सम्मेलन में भाग लेने इंदौर आए थे।

60 वर्षीय मुकुंद कस्तूरे ने बताया कि हिंदी अंकों वाली यह पहली हस्तनिर्मित घड़ी थी। गांधी जी जिस घड़ी को कमर में लटका कर रखते थे, वह 1947 में पटना से दिल्ली जाते वक्त खो गई थी। यह खबर अखबारों के जरिए जब उनके पिता को पता चली तो उन्होंने गांधी जी को इंदौर से दिल्ली टेलीग्राम कर अपने ट्रेडमार्क उद्यम की घड़ी उन्हें भेंट करने की इच्छा जाहिर की।

मुकुंद ने बताया कि उनके पिता की यह इच्छा 11 जून 1947 को पूरी हो गई जब उन्होंने चांदी के केस में जेब घड़ी और एक हस्तनिर्मित टेबल घड़ी बापू को भेंट की। इस घड़ी के अंक हिंदी में थे। बापू की शहादत के दिन 30 जनवरी 1948 तक यही घड़ी उनके पास थी। 

source :daily jagran, Indore edition

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घड़ी कमर में लटकाऊंगा.. मैं गांधी बन जाऊं

>> Friday, March 6, 2009

बचपन में पाठ्य पुस्तक में एक कविता पढ़ी थी, “मां खादी की चादर दे दे , मैं गांधी बन जाऊं।”

कविता में एक बच्चा मां से गांधी जी के जैसी वस्तुएं दिलवाने की मनुहार करता है ताकि वह भी उन्हें लेकर गांधी जी जैसा दिख सके।

उसमें गांधी जी की मशहूर घड़ी का जिक्र था। गांधी जी घड़ी हाथ में नहीं बांधते थे, कमर में लटकाते थे। “घड़ी कमर में लटकाऊंगा…”

तब बाल मन के लिए गांधी जी आदर्श थे, उनकी तरह कमर में घड़ी बांधने की उत्सुकता होती थी।

आज वही घड़ी तस्वीर में देखने को मिल रही है क्योंकि उसकी अमेरिका में नीलामी हुई है।


क्या आपको वह पूरी कविता और लेखक का नाम याद है?
कविता कुछ इस प्रकार थी:-

मां खादी की चादर दे दे, मैं गांधी बन जाऊं
सब मित्रों के बीच बैठ कर रघुपति राघव गांऊ

घड़ी कमर में लटकाऊंगा सैर सवेरे कर आऊंगा

मुझे रुई की पोनी दे दे

तकली खूब चलाऊं

मां खादी की चादर दे दे, मैं गांधी बन जाऊं


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ईमेल फ्रॉड

>> Wednesday, January 21, 2009

आप लॉटरी में लाखों डॉलर के इनाम जीत गए हैं, पर इसे पाने के लिए आपको कुछ पैसे भेजने होंगे। इस तरह के ईमेल अब बीते दिनों की बातें हो गई हैं। ईमेल के जरिये फ्रॉड के अब ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिससे निपटने में सिक्युरिटी एक्सपर्ट भी नाकाम नजर आ रहे हैं।

हाल ही में एक कॉलेज स्टूडेंट के पास उसके दोस्त का मेल आया। मेल में इस स्टूडेंट के दोस्त ने कहा था कि उसका वॉलेट गुम हो गया है और उसे करीब 8 हजार रुपये की सख्त जरूरत है। इस मेल में उस स्टूडेंट के दोस्त का डिजिटल सिग्नेचर भी था। पर जब स्टूडेंट ने दोस्त को फोन लगाया तो उसे पता चला कि उसके दोस्त ने ऐसा कोई मेल ही नहीं भेजा है।

ईमेल के जरिये इस तरह फ्रॉड की घटनाएं और ऐसी कोशिशें तेजी से बढ़ रही हैं। यदि आप सोचते हैं कि आप इसका शिकार नहीं हो सकते हैं, तो आप गलत हैं।
इस तरह के फ्रॉड से बचने का सबसे पहला और जरूरी उपाय यह है कि आप अपने 2 ईमेल आईडी रखें। एक ऑफिशल और दूसरा पर्सनल। दोनों ही आईडी का पासवर्ड लंबा या बड़ा रखने की कोशिशि करें। पर ध्यान दें यदि आप यह सोचकर आसान पासवर्ड रखते हैं कि इसे आपको याद करने में आसानी होगी, तो आपके लिए खतरा भी है। साइबर हैकरों के निशाने पर सबसे ज्यादा आसान पासवर्ड ही होते हैं। पासवर्ड चुनते वक्त वर्ड और डिजिट का मिक्स हो काफी बढ़िया रहेगा। हां, पासवर्ड में अपना नाम, अपने पति/पत्नी का नाम, बच्चों का नाम, टेलिफोन नंबर और जन्मदिन का इस्तेमाल करने से हमेशा बचना चाहिए।

यदि आपको इस तरह के ईमेल मिलते हैं कि 'आपने डॉलर जीत लिया है'या फिर 'आपने ट्रिप जीत ली है' तो सतर्क हो जाएं। जाहिर तौर पर इसके पीछे को छिपी हुई चाल होगी। इस तरह के ईमेल को देखकर लालच में आने की जरूरत नहीं है। ये मेल आपको खतरनाक साइट की ओर ले जाएंगे। यदि आप ऐसे मेल के बहकावे में आ गए तो इससे आप या तो अनजाने में वायरस डाउनलोड कर लेंगे या फिर अपने कंप्यूटर को हैकरों के हवाले कर बैठेंगे। इतना ही नहीं, यदि किसी अनजान पते से आपके पास कोई हॉट लिंक क्लिक करने का ऑप्शन आता है तो भी आप उसे खोलने की गलती न कर बैठें। ऐसे किसी भी मेल के जवाब में अपनी पर्सनल इन्फर्मेशन कभी भी न दें। यदि आप मेल की सचाई का पता लगाना चाहते हैं तो सेंडर की वेबसाइट का पता सीधे टाइप कर पता लगाएं, मेल का कोई जवाब न दें।

वायरस स्कैनिंग और रिमूवल के लिए अपने पीसी या लैपटॉप में सिक्युरिटी सॉफ्वेयर इन्सटॉल करें। अपने कंप्यूटर के सिक्युरिटी अपडेट लगातार चेक करते रहें। आपका सिक्युरिटी अपडेट जितना बेहतर होगा, खतरा उतना ही कम होगा। कंप्यूटर में एंटी-वायरस और एंटी स्पाईवेयर प्रोग्राम इन्सटॉल करना फायदेमंद रहेगा। कुछ सॉफ्टवेयर फ्री में उपलब्ध हैं। नॉर्टन एंटी-वायरस, McAfee और ट्रेंट माइक्रो जैसे सॉफ्टवेयर के लिए पे करना पड़ता है।

कई बार आपके पास किसी बैंक ने नाम से ईमेल आते हैं, जिसमें आपसे आपकी पर्सनल इन्फर्मेशन मांगी जाती है। इस तरह के करीब 90 परसेंट ईमेल फर्जी होते हैं। यदि आपको ऐसे ईमल आते हैं तो आप इस पर रिस्पॉन्ड न करें। आप पहले उस URL (वेब अड्रेस जिससे ईमेल आया है) को सावधानी से चेक करें। कभी भी वैसे किसी व्यक्ति या वैसी किसी संस्था को ईमेल पर अपनी पर्सनल इन्फर्मेशन न दें, जिसे आप जानते नहीं हैं। यदि आप ईमेल पर पर्सनल इन्फर्मेशन दे रहे हैं तो हमेशा इस बात का ख्याल रखें कि जिस किसी को भी आप यह डीटेल दे रहे हैं, उसे डिटेल मुहैया कराना खतरनाक नहीं है।

साइबर कैफे ऑनलाइन क्रिमिनल्स के लिए हॉट स्पॉट होते हैं। लिहाजा साइबर कैफे से किसी को भी ईमेल के जरिये पर्सनल डीटेल भेजने से परहेज करें। अपनी कोई भी फाइनैंशनल डीटेल, अकाउंट नंबर, पासवर्ड आदि भेजने से बचें। साइबर कैफे से निकलने से पहले इस बात की पूरी तरह जांच कर लें कि आपने जो भी ऐप्लिकेशंस खोले थे, उसे लॉग आउट कर दिया है। वैसे साइबर कैफे में जाने से भी परहेज करें, जहां वाई-फाई जैसे वायरलेस नेटवर्क का इस्तेमाल होता है, क्योंकि ऐसी जगहों पर प्राइवेसी और सिक्युरिटी कम होती है।

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इंटरनेट एक्सप्लोरर इस्तेमाल करने वाले सावधान

>> Saturday, December 20, 2008

लंदन. माइक्रोसाफ्ट ने ऐलान किया है कि दुनिया का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जानेवाला वेब ब्राउजर इंटरनेट एक्सप्लोरर खतरनाक है। माइक्रोसाफ्ट ने कहा कि इसे इस्तेमाल करने वाले यूजर्स के कम्प्यूटर हैक हो सकते हैं। इसका कारण एक्सप्लोरर की सुरक्षा खामिया हैं। खुद इंटरनेट एक्सप्लोरर को बनाने वाले माइक्रोसाफ्ट कापरेरेशन ने इस बात की घोषणा कर इंटरनेट यूजर्स में डर पैदा कर दिया है। उन्होंने इस बात का खुलासा किया है कि उनके वेबबाउजर को इस्तेमाल करने वाले कई लोगों की गोपनीय जानकारियां चोरी हो गई हैं। यह चोरी उस वक्त हुई जब उनके यूजर ने कुछ विशेष वेबसाइट्स सर्फ की।

माइक्रोसाफ्ट ने अपने ब्लॉग मालवेर प्रोटेक्शन में यह साफ साफ कहा है कि इंटरनेट एक्सप्लोरर 7 इस्तेमाल करनेवाले यूजर के कम्प्यूटर हैक किए गए हैं। इस बात से सबसे ज्यादा चीनी वेबसाइट्स को नुकसान पहुंचा है। कई गेम कंपनी की साइट से सूचना चुरा कर हैकर्स ने उन्हें कालेबाजार में बेच दिया है। हैकर बैंक और अन्य गोपनीय सूचना भी चुराने में कामयाब रहे हैं। माइक्रोसाफ्ट इससे निपटने के लिए काम कर रहा है। फिलहाल उसने अपने यूजर्स से एंटी वायरस और एंटी स्पायवेर इस्तेमाल करने का आग्रह किया है। वेब विशेषज्ञों के अनुसार इंटरनेट एक्सप्लोरर के बजाए फायरफॉक्स, सफारी या ओपेरा वेब ब्राउजर इस्तेमाल करना बेहतर होगा।

http://www.microsoft.com/technet/security/bulletin/ms08-078.mspx


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‘वेडनेसडे’ से वेडनेसडे तक

>> Saturday, November 29, 2008

परदे के पीछ आतंकवादियों ने नसीरुद्दीन शाह अभिनीत ‘ए वेडनेसडे’ देखी है जिसमें नायक कहता है कि दुष्ट शक्तियों ने शुक्रवार, शनिवार को हमले किए हैं। जिसके जवाब में मैंने बुधवार को चुना। इस राष्ट्रीय संकट की घड़ी में मन में उठे ज्वारभाटे को संयत रखकर तर्क के आधार पर मनन करना चाहिए। इस समय अपने राजनीतिक विचारों और व्यक्तिगत-धार्मिक पूर्वग्रहों को तजकर सोचना चाहिए। यह नारेबाजी का समय नहीं है।

कांग्रेस को दोष देने वाले भूल जाते हैं कि वाजपेयी के शासनकाल में आतंकी संसद में घुस गए थे। नरेंद्र मोदी जैसे सशक्त मुख्यमंत्री की नाक के नीचे अहमदाबाद में आक्रमण हुए और जयपुर के साइकिल बम धमाकों को कैसे भूला जा सकता है। आतंकवादी संगठन यह नहीं देखते कि कौन सत्तासीन है। यह मामला धर्म से भी नहीं जुड़ा है।

गौरतलब है कि जैसे भारत में अनेक भारत मौजूद हैं, वैसे ही पाकिस्तान में अनेक पाकिस्तान मौजूद हैं और वहां का अवाम भी हमारे अवाम की तरह असहाय है। पाकिस्तान में विगत साठ वर्षो से सेना प्रमुख भूमिका में हैं और इतनी शक्तिशाली है कि नेताओं की इच्छा के खिलाफ भी काम करती है।

पाकिस्तान की जन आकांक्षा को सेना कभी अहमियत नहीं देती। तालिबान ताकतों की घुसपैठ पाकिस्तानी समाज और सरकार में बहुत गहरी है और उन्हें भारत को नुकसान पहुंचाना पसंद है। पाकिस्तान से आकर मुंबई पर आक्रमण करने वाले न इस्लामी हैं और न ही पाकिस्तानी। वे उस दल के हैं जो पूरे विश्व में शांति के खिलाफ हैं।

भारत पर विश्व की मंदी का असर अन्य देशों की तुलना में कम पड़ रहा था, अत: उसके आर्थिक आधार पर आघात किया गया है। भारत के तमाम शहरों से भारी मात्रा में धन मुंबई आता है क्योंकि तमाम बड़ी कंपनियों के मुख्यालय यहां पर हैं, अत: मुंबई को अस्थिर करना उन्हें भारत को तोड़ने की तरह लगता है।

आमतौर पर हमले आम आदमी के ठिकाने पर होते आए हैं और पहली बार भारत के अमीर लोगों के ठिओं को निशाना बनाया गया है। नवंबर और दिसंबर के पहले दो सप्ताहों में अनेक मल्टीनेशनल कंपनियों के शिखर अधिकारी भारत आते हैं और नए व्यापारिक अनुबंध होते हैं। अत: इस बार एक तीर से दो शिकार किए गए।

आतंकवादी संगठनों में बहुत काबिल लोग सक्रिय हैं और उनके पास हमारी पुलिस से अधिक जानकारियां हैं। मुंबई के नरीमन भवन में इजरायली रहते हैं जैसी जानकारी भी उनके पास थी। टेक्नोलॉजी का भरपूर फायदा वह उठाते हैं। उनके पास पुलिस से बेहतर शस्त्र हैं। उनका प्रशिक्षण भी उच्चतम मानदंड पर किया गया है। उनके मन में पैदा किया गया उन्माद और मृत्युइच्छा उनकी कुशलता को धार प्रदान करती है। इस राष्ट्रीय संकट से उबरने में केवल एक ही चीज हमारी सहायता कर सकती है और वह है राष्ट्रीय चरित्र का विकास और उसकी निर्भीक अभिव्यक्ति।

यह काम राजनैतिक दल नहीं कर सकते क्योंकि राष्ट्रीय चरित्र के विकास के साथ ही उनके निजी स्वार्थ और सत्ता का लालच मर जाएगा। सत्ता के समीकरणों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय चिंता का समय है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश की सुरक्षा और उनका भविष्य उनके भूतकाल से जुड़ा है और समग्र एशिया की शांति के उद्देश्य के साथ ही यह लड़ाई लड़ी जा सकती है।

दैनिक भास्कर से सभार

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जीवन में भी है गार्बिज इन, गार्बिज आउट

>> Friday, November 21, 2008

एक बालक अपने पिता के साथ भ्रमण करते हुए किसी पर्वतीय क्षेत्र में जा पहुंचा। चारों ओर ऊंचे-ऊंचे पर्वत मानो उन्हें चिढ़ा रहे थे। अचानक वहां एक स्थान पर बच्चे का पैर फिसला। पैर फिसलने पर उसके मुंह से 'आह-आह' का स्वर निकला। यही आह-आह की आवाज पहाड़ों से भी प्रतिध्वनित होकर आई, जिसे सुनकर वह बच्चा हैरान रह गया। इस पर बच्चा जोर से चिल्लाया- तुम कौन हो, वापस लौटकर वही आवाज आई - तुम कौन हो? इस पर नाराज़ होकर बच्चा बोला- तुम कायर हो। तब पलटकर आवाज आई- तुम कायर हो।
बालक ने चकित होकर अपने पिता से पूछा- यह क्या हो रहा है? पिता मुस्कराए और बोले- अब मैं भी कुछ कहता हूं, इसे ध्यान से सुनना। इतना कहकर वे जोर से चिल्लाए- मैं तुम्हारी प्रशंसा करता हूं। तुम अद्भुत हो। वही आवाज लौटकर आई। बालक को कुछ भी समझ न आया। तब पिता ने बताया कि आवाज के इस तरह लौटकर आने को प्रतिध्वनि कहते हैं। जो बात हम पहाड़ों से कहते हैं, वही बात लौटकर हमारे पास आती है। 

फिर पिता ने समझाया- बेटा, जीवन भी ऐसा ही है। यहां हम जो भी कहते या करते हैं, वही हमें वापस मिलता है। हमारा जीवन हमारे कामों की ही प्रतिच्छाया है। 

पुन: उन्होंने समझाते हुए कहा- जब हम छोटे थे तो हमें पढ़ाया जाता था कि जैसा बोओगे, वैसा काटोगे। कंप्यूटर की आधुनिक भाषा में यही बात इस तरह कही जाती है- गार्बिज इन, गार्बिज आउट। इस संसार का यही नियम है। हमेशा ऐसा ही होता आया है। बस हमें यह पता नहीं होता कि कब और कैसे कोई बात हो जाती है? यदि हम किसी को मित्र बनाते हैं, तो हमें उससे निष्कपट प्रेम करना होगा। 

किसी को धन-संपत्ति दे देना प्रेम नहीं होता, किंतु किसी की व्यथा का अनुभव कर उससे मीठा बोलना या सहानुभूति देना महत्व रखता है। जब हम कष्ट में मदद का हाथ बढ़ाते हैं, तो हम बहुत कुछ दे देते हैं। पर कई बार लोगों का व्यवहार इसके उलट होता है। अगर कोई व्यक्ति अपने किसी पड़ोसी की कोई मदद करता है, तो कुछ समय बाद वह पड़ोसी को उसके प्रति किए गए उपकारों की याद दिलाता है कि देखो, मैंने तुम्हारी फलाना-फलाना सहायता की थी। इस तरह उन अच्छे कामों को गिन-गिन कर पड़ोसी पर कृतघ्नता का बोझ लादते हैं। यही नहीं, दूसरों के राई भर दोष को बिल्व फल के समान तथा अपने बिल्व के समान दोष को राई के समान समझते हैं। 

समस्या तो यह है कि हम ईश्वर तक से ऐसा ही व्यवहार करते हैं। ईश्वर हमें अपने दिव्य भंडार से दिल खोलकर अन्न, जल, प्रकाश तथा वायु देता है, परंतु इतना सब कुछ पाने पर भी हम उसके अहसान को भूल जाते हैं। यदि हमें ईश्वर से तथा उसके बनाए हुए जीवों से प्रेम चाहिए, तो हमें अपने आप में नदी जैसी उदारता, सूर्य जैसी कृपालुता तथा पृथ्वी की भांति आतिथ्य भाव उत्पन्न करना होगा। हम वणिक की भांति व्यापार की भावना न रखें कि एक सत्कार्य के बदले में फल की प्रतीक्षा करने लगें। किसी नेकी और प्रेम का प्रतिदान कब कहां और किस रूप में मिलेगा- इसका हमें ज्ञान नहीं हो सकता, पर जीवन में वह प्रतिदान मिलता अवश्य है।

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